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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग -5)  (पूर्व से आगे)

 

अथ कथा जय श्री भगवानकामतानाथ ) में भगवान के जन्मदिन के बहाने एक आतंक भरी फैंटेसी उर्फ फैंटेसी का आतंक है. अब्दुल बिस्मिल्लाह की नदी किनारे शाम एक निर्दोष भावुक अपील से लिखी गयी कहानी है, एक बूढ़ा जो कभी नहीं मरता और ‘परदेशी’ जो उम्र के अंतरालों पर उन्हें तलाशता है और आसमान चिड़ियों से भर जाता है. इस कहानी में एक जगह अब्दुल जी ने लिखा है, “सभी ऋतुएं समय से आयीं और गयीं, गांव की कुछ गायों ने बछड़े जने और कुछ बछियाएं. एक कुम्हार जो बहुत दिनों से बीमार था मर गया. दो युवक डकैती करते हुए पकड़ लिए गये. सब्जी तो महंगी हुई थी अन्य चीजें भी महंगी हो गयी.” समय को मापने का यह अंदाज मुझे परेशान करता है और विचलित भी. बहुत दिनों से बीमार,  मर गये कुम्हार और डकैती में पकड़ लिये गये युवक को इस तरह दिनचर्यात्मक घटनात्मकता से जोड़ देना मुझे संवेदना का यथास्थैतिक हनन लगता है, जो हम झीनी-झीनी बीनी चदरिया के अब्दुल जी से उम्मीद नहीं करते. इन निर्वैयक्तिक स्थितियों के विरुद्ध निर्मल वर्मा की एक चिंता देखिए,  ” क्या कोई इतिहास में लिखेगा कि सितंबर 1955 की शाम को सड़क पर चलती हुई भीड़ में से  एक  चेहरा हँसा था” ( सितंबर की एक शाम, परिंदे ). और अस्तित्व को ‘आइडेंटीफाई’ करने की इस चिंता तक निर्मल वर्मा अचानक और किसी वैयक्तिक रुझान से अनायास नहीं पहुंचते हैं, बल्कि इसकी एक निरंतर प्रक्रिया है. पिक्चर पोस्टकार्ड कहानी में इसे देखा जा सकता है. जब परेश एसप्रेसो रेस्तरां में रात के ठीक दस बजे जूक बॉक्स में  रिकॉर्ड बजाता है- थ्री कायन्ज इन द फाउन्टेंन. इसलिए कि नीलू ने कहा था जबकि इस समय वह  ट्रेन में होगी. मैं समझता हूँ यह भावना न केवल मनुष्य की निजी दैहिक भौतिकता का अतिक्रमण करती है वरन् इससे आगे व्यवस्था की भौतिकता, जो नीलू द्वारा हर शहर से पिक्चर पोस्टकार्ड भेजने के आग्रह से अभिव्यक्त होती है, के विरुद्ध कुछ बचा लेने की जिद से जुड़ जाती है. और निर्मल वर्मा पर नामवरी पश्चाताप के बाद अगर आप परिंदे से नाक-भौं सिकोड़ने की मुद्रा में न हों तो यह देखना महत्वपूर्ण है कि पिक्चर पोस्टकार्ड कहानी में अमूर्त रूप से व्यक्त यह भाव परिंदे कहानी में ठोस प्रतीक के रूप में सामने आता है जब मिस लतिका जूली के तकिये के नीचे नीला लिफाफा दबाकर रख देती है. अविवाहित मैडम द्वारा अपनी छात्रा को उसके प्रेम-पत्र वापस कर देने की यह प्रक्रिया विलयन की वह अवस्था है जहां अस्तित्व का पारदर्शी क्रिस्टल आकार ग्रहण करता है. मैं नहीं समझता कि व्यक्ति और व्यक्ति की अस्ति के सूचकों को नकार कर सामुदायिकता की बात की जानी चाहिए या की जा सकती है.

 

(आगामी पोस्ट में वर्तमान साहित्य महाविशेषांक की कहानियों की चर्चा जारी)

…..जारी

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हिंदी  कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग -3) (पूर्व से आगे)

निर्मल वर्मा की बावली को शायद अस्तित्व के अंतःसंचरण के रूप में देखना कठिन हो पर आप इसे उसकी उपस्थिति के अंतःसंचरण के तौर पर ले सकते हैं. यहां तोशी माँ के छुपकर किये जा रहे प्यार से रची जाती अजनबी दुनिया में अपने पिता के अस्तित्व (उपस्थिति) को कांप कर हवा में गुम हो जाने से बचाती है. यह तोशी द्वारा अपने पिता की उपस्थिति बचने का जतन  जो कि उनकी अठन्नी चाँद में अशर्फी सी चमकती है, तोशी का ‘एलियनेशन’ से मुक्त होना है. वह माँ जो अपनी आतुरता और उल्लास में तोशी में खतरे की टोह लेती है, उसके प्रति निस्संग भाव से तोशी सोचती है, “घर की देहरी के बाहर कितने खतरे दिखाई देते थे उनके बीच चलती हुई बीजी कितनी छोटी हो जाती थी.” यह उसका अकेलापन है जो उसकी माँ ने रचा है और जिसके विरूद्ध वह आइने के सामने खड़े होकर खुद में पिता को तलाशती है और अजनबी अंकल के दिये  दस के नोट से चिपकी गंध को चिन्दियों में फाड़कर गुल्लक में रख देती है. यह वही अकेली(बावली) लड़की है जो कुछ खोने से डरती है, जो पाना सब कुछ चाहती है. वह खुले चाँद में खड़ी है, और उसकी हथेली में अठन्नी  अशर्फी की तरह चमकती है.

मनोज रूपड़ा की जबह पढ़ते हुए मुझे लगा यहां न केवल अस्तित्व अंतःसंचरित होता है वरन् वह एक दूसरे  में विकास भी करता है. कहानी के आरंभ में मनु है जो अपने अंदर अपनी निकहत रचता है और माँ अपने अंदर अपना मंजूर हसन बचाती है. और तब तक दोनों की दुनिया नितांत अपनी है. कुछ हद तक सूनेपन से भरी, बहुत हद तक अजनबी. वहीँ समय की सांप्रदायिकता के रेशे हैं और ऊपर सहजता की चिकनाहट. यहीं कहीं वह दबाव है जो उस बीते समय को हमारे बीत रहे समय से जोड़ता है और हमें एक साथ सारे समयों में अकेला करता है. मंजूर हसन की हत्या और निकहत की आत्महत्या, और कि उसकी कारक परिस्थितयों पर थीसिस लिखती मनु की माँ, यह सब जो एक जड़ता भरे समय की स्वीकारात्मकता है मनु उसे तोड़ता है. वह माँ के अंदर निकहत और माँ, मनु के अंदर मंजूर हसन का विकास करती है, यह न केवल दो पीढ़ियों का मार्मिक जुड़ाव है बल्कि उनके दो स्वतंत्र अस्तित्व की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी जो जबह का कलमा पढ़े जा रहे इस समय में बचा है एक राहत की तरह.

रमेश उपाध्याय ने इलाहाबादी लेखक त्रय द्वारा ऐ लड़की कहानी को “बेजोड़,अद्भुत और कालजयी” बतानी को ” प्रायोजित चर्चा के प्रवर्तन का अप्रतिम उदहारण “ठहराते हुए लिखा है, “उन्होंने सिर्फ एक कहानी पढ़ी और उसी को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया”(हिंदी कहानी का जनतंत्र, पहल-42). इसलिए सचेत रूप से मैंने वर्तमान साहित्य महाविशेषांक‘ की सभी कहानियों की चर्चा करने के कोशिश आगे की है जबकि एक लुप्त होती हुई नस्लजुमराती मियां और एक वक्त की रोटी की चिंताओं में सहज जुड़ाव है और ये कहानियां कई मायनों में श्रेष्ठ हैं, पर इस चर्चा से वर्तमान कहानी के कंटेंट और फार्म की विविधताओं और सीमाओं को समझने की कोशिश हो सकती है  और यह एक भली सी बात होगी.

(आगामी पोस्ट में वर्तमान साहित्य महाविशेषांक की सभी कहानियों की चर्चा)

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हिन्दी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग -2) (पूर्व से आगे)

शायद यह स्पष्ट कर देना आवश्यक हो, मैं कतई नहीं मानता कि नारी लेखन और पुरुष लेखन जैसी कोई चीज होती है और हो भी तो वह रचना के मूल्यांकन का आधार नहीं बन सकती. पर बतौर वर्गीकरण, मुझे लगता है आज का महिला लेखन  अपने जिस स्वरुप में ज्यादातर है वह एक किस्म की रचनात्मक तलाश तो है पर अविष्कार नहीं. कह सकते हैं कि तलाश का निजी दुनिया की जरूरतों से ज्यादा जुड़ाव है कि अविष्कार एक किस्म की रचनात्मक विलासिता है. पर राजेंद्र यादव की शब्दावली में कहें तो ‘इन्वेंशन’ कहीं-न-कहीं आपकी रचनात्मकता को ‘ओरिजनल’ बनाता है और साथ ही तलाश की प्रक्रिया के सिरों को समझने में भी मदद करता है कि जिसकी अनुपस्थिति में आप ‘दयनीय जस्टिफिकेशन’ से मुक्त नहीं हो पाते हैं. यह अकारण नहीं है कि नारी मुक्ति बनाम नारी चेतना को लेकर आज कई भ्रम रचे जा रहे हैं कि कई महिला रचनाकार जहां इस बहाने अपने को ‘वुमेन लिब’ के आंदोलन से जुड़ा समझने के आत्मसुख से भरी हैं वहीँ वे अपने अंदर एक अभिजात्य किस्म की सैडिस्ट प्रवृत्ति का भी विकास कर रही हैं. उषा प्रियम्वदा का एक प्रसिद्ध उपन्यास है शेष यात्रा (1984).  इसमें एक सरल लड़की अनुका की शादी प्रवासी भारतीय प्रणव से होती है और कुछ अंतराल के बाद उनकी शादी असफल हो जाती है. विदेश में वह अकेली लड़की अपने मौलिक अस्तित्व का अविष्कार करती है. वह खुद डॉक्टर बनती है दीपांकर से विवाह करती है और इस तरह सुख भरे जीवन में लौटती है. यहां तक तो ठीक है पर अंत में अनु की मुलाकात प्रणव से हास्पीटल में होती है. वह मृत्यु के रास्ते पर है. और एक दिन वह अनु से बिना मिले अपना टेस्ट कैंसिल कर वहां से चला जाता है. प्रणव को इस तरह निरीह बना और उसे एक अनिवार्य अपराध बोध से भर उषा जी आखिर क्या कहना चाहती हैं? क्या इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि अनुका जिस मुक्ति को पाती और जीती है उसे चुनने के निर्णय के स्वीकार से बचती है. मुझे यहां  प्रेमचंद की एक कहानी इस्तीफा (पांच फूल) याद आती है जिसका मध्यवर्गीय नायक अपने ऑफिस  में क्रूर अपमान विवश होकर सहता है और तनाव में घर लौटता है. उसकी पत्नी स्थिति जान उसे उत्प्रेरित करती है और साहस के साथ इस्तीफा के निर्णय में निर्णायक सहभागिता निभाती है. एक सीधी-सादी कहानी में  अगर प्रेमचन्द इतनी बड़ी बात कह पाये तो यह वर्ग चेतना की समझ से ही हो सका. दरअसल नारी चेतना की बात वर्ग चेतना को उत्क्रमित कर की ही नहीं जा सकती. नारी मुक्ति अगर कोई वायवी चीज नहीं है तो वह शोषण मुक्त परिवेश में ही आकार ले सकती है. नारी लेखन की यह जिद कि वह नए सवाल खड़े कर उनसे जूझेगी सचमुच तमाम रचनात्मकता के लिए विस्मयकारी है. पर इसके बावजूद ऐसा है कि महिला लेखन में  वह तत्व है जिसे आप बतौर लेखन रेखांकित करने से बच नहीं सकते. और यह बेझिझक कहा जा सकता है कि जिस लेखन को आप रचनात्मकता की वजह से जानते हैं वह कृष्णा सोबती का है जिनकी  कहानी   ऐ लड़की आज चर्चा में है. और ‘स्पीड पोस्ट बनाम सपोर्ट पोस्ट’ जैसे कई संदेहों व संजीव की टिप्पणी कि वहां ‘सिवाय अपनी जीभ व विकलांगता के अबसेशन’ के कुछ नहीं है और इसके बावजूद कि सृंजय हिंदी पाठकों को कौवा समझते हैं. कौवे उड़ाने के उन्होंने एक ढेला फेंका है “रौंदी गई फसलों के बीच ऐ लड़की का बिजूका”. अब भले ही पुरुषोत्तम अग्रवाल के मुल्ला नसरुद्दीन उवाचते रहें- बात इससे साफ हो सकती है अगर आप जानते हों कि बिजूका, सृंजय की एक लघुकथा का शीर्षक है और सृंजय मचान पर बैठे अपने खेत देख रहे हैं!

……तो संभव है यह संयोग हो पर मैं इसे महत्वपूर्ण मानता हूँ कि ऐ लड़की की चर्चा निर्मल वर्मा की बावली और मनोज रूपड़ा की जबह (तीनों वर्तमान साहित्य, महाविशेषांक) के सन्दर्भ में बेहतर की जा सकती है. यह बात रचनात्मकता की सततता (continuum) की ओर  इशारा करती है अगर तीन भिन्न रचनाकारों की रचनाओं के अंतःसूत्र एक हों. तीनो कहानी में ध्यान दें तो ऐसा लगता है यह अस्तित्वों के अंतःसंचरण की कथा है. ऐ लड़की में माँ और लड़की का एक दूसरे में परस्पर घुलना है. वहां माँ अपनी जीवन-स्मृति लड़की में खोलती है और इस तरह जीने की इच्छा का आवाहन करती है (तुम्हें बार-बार बुलाती हूँ तो इसलिए कि तुमसे अपने लिए ताकत खींचती हूँ) और उस अनुभव को छू पाती है, “मैं तुमलोगों की माँ जरुर हूँ पर तुमसे अलग हूँ. मैं तुम नहीं और तुम मैं नहीं. मैं मैं हूँ.” पर इस अनुभव को पाने के पहले वे एक परकाया प्रवेश जैसी चीज से गुजराती हैं, वह है एक दूसरे को पाना. लड़की से बात करती हुई माँ उसके खीझने पर कहती है, “मैं तुम्हें चुभा थोड़े रही हूँ. सखि-सहेलियां भी ऐसी बातें कर लेती हैं.” यही माँ द्वारा लड़की को एक स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में पाने की विनम्र प्रक्रिया है. यहां परम्पराओं की दुनिया से वर्जनाओं की मुक्ति है. उन  वर्जनाओं की जो आख़िरी बीमारी में नाना पुत्र-मोह के अधीन पास खड़ी बेटियों को आवाज नहीं देते हैं. माँ भी इससे बच नहीं पाती. वह अंत में फिर इसी पारंपरिक वर्जना की ओर लौटती है. वह मृत्यु के अंतिम क्षण कहती  है, “डॉक्टर को नहीं अपने भाई  को बुला. खूंटे पर से मेरा घोड़ा खोल देगा समुद्र पार हो जाऊंगी.” और लड़की उसे उस समुद्र में डुबकी ले नहा लेने कहती है. वह अब आश्वस्त है माँ के अस्तित्व के प्रति कि माँ ने उसे ‘डिसकवर ‘ कर लिया है.

…..जारी

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