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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग- 13) (पूर्व से आगे)

“आपका निर्णय आपको निर्णायित और परिभाषित करता है,” ज्यां पाल सार्त्र की इस पंक्ति से बल्लभ सिद्धार्थ अपनी कहानी अश्लील आरंभ करते हैं. ‘आपका निर्णय, जो आप सदी की उतराई में करते हैं. निर्णय वह जो भेड़िये में खारु करता है. निर्णय वह जो अश्लील में अपंग अधेड़ करता है- धीरे-धीरे सब कुछ- लड़की (नंदिनी), राजे, अपना दुःख और एकांत एक अश्लील दुनिया के हवाले करता है. “रेगिस्तान से जिन्दा बचने का एक ही उपाय होता है जैसे भी हो इसे पार किया जाए, जैसे भी हो.” रेगिस्तान- कहीं यह भेड़िये के तनाव को ही तो आज के संदर्भों में नहीं महसूसती, पर नहीं कि  भेड़िये में जो ‘रेसिस्ट’ न कर पाने की ‘योग्यता’ है वह यहां ‘रेसिस्ट’ कर पाने का ‘स्वीकार’ है. एक प्रबुद्ध पाठक ज्ञानी राम महतो (हंस, जुलाई, 1987) लिखते हैं, “इन कहानियों से होकर गुजरना एक आतंक भरे माहौल से होकर असहज एवं सचेष्ट रूप से गुजरना है.”

बल्लभ सिद्धार्थ अधेड़, लड़की और पुरुष की कहानियां श्रृंखलात्मक रूप से एक उपन्यास के लिये लिख रहे हैं और इससे कई बार पाठक भ्रमित भी होते हैं. इक्कीसवीं सदी की ओरईडन का बगीचाबिना खिड़कियों का कमराचौबीसवां नरकइतिहास का बैताल और अब फिर अश्लील पढ़ते हुए मुझे लगा बल्लभ सिद्धार्थ की यह यथार्थ की तह तक पहुंचने की जिद है जो कभी-कभी अनियंत्रित आक्रोश के रूप में भी प्रकट होती है. स्पष्टतः अगर कोई रचना इतने लंबे अंतराल तक रचनाकार को दबाव में रखती है तो यह आभास होता है कि वह इससे कितना गहरे जुड़ा है. अश्लील की जो खासियत है कि अपनी खीझ और आक्रोश को लंबे संश्लेषण के बाद यह कहानी अपनी सम्पूर्ण नियति के रूप में पा सकी है. सबसे बड़ी बात जो कहानी करती है कि वह अश्लीलता का आतंक तोड़ती है. वहां वह अश्लील नहीं है जो अनावृत है, नंगा है बल्कि वह है जिसे हम अपनी नकार में स्वीकार किये चलते हैं. जहां हां और ना करने का विकल्प शेष हो जाता है. शम्भू गुरु, जो नेता का छुटभैया संस्करण है अपनी अश्लील जिज्ञासा से ‘नंदिनी बाई, नंदिनी बाई’ पुकारता आता है और कोई सुराग न पाकर सिलाई के लिये कपड़ा और पचास रुपये एडवांस देकर चला जाता है, और जिसे लड़की झिझकते हुए और अधेड़ समझते हुए स्वीकार करते हैं. और फिर चहारदीवारी पर खड़ा होकर मकान मालिक का बेटा मोंटू किराया वसूलता है और अधेड़ उसी पचास में दस मिलाकर उसे टरकाता है. इस तरह वह लाचार समझे जाने को जीने की शर्त में शुमार कर लेता है. लगता है जैसे प्रतिकार का भी अंत हो गया कि अधेड़ ने शम्भू गुरु द्वारा लड़की की समूची देह पीने को स्वीकार कर लिया है. यहीं अश्लीलता आरंभ होती है. और आप ऐसी दुनिया जीने के लिये पाते हैं जहां राजे जीतने का भेद जानकर जुआ खेलने के लिये गुली चुराकर बेचता है और सौदेबाजी से पांच रुपये ऐंठता है. यह अश्लील दुनिया में नयी पीढ़ी के अस्तित्व का संघर्ष है. यहां अश्लील वह नहीं रह जाता है जो राजे ने किताब के दो आदिम मुद्रा में एक नग्न युग्म पर मामा और मम्मी लिखा है. अश्लील तो वह है जो बिट्टी इककीस सौ की देनदारी का परचा पुरुष को देती है और पुरुष करुण मुस्कराहट से विवाह  मंडप में पहनाये पत्नी की अंगूठी वाला हाथ आगे बढ़ाता है. यह यशपाल की फूलों का कुरता और परदा की परंपरा का सीधा विकास है. इस पर अधेड़ की टिप्पणी है,”हम किस कदर हिंसक वक्त में रह रहे हैं.”

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 12) (पूर्व से आगे)

इफ्तखार अपने सतत ‘एलियनेशन’ से कब मुक्त होता है? शुकदेव सिंह इसे ‘खत्म होती दिलचस्पियों की रफ़्तार कहते हैं पर यह शायद उतना सटीक नहीं है. क्योंकि धीरे-धीरे वह अपने इस अस्तित्ववादी दर्शन से एकाकार होता है कि दुनिया उसके लिये घूम रही है. स्वयं मात्र को बचाने के लिये सारे गृहस्थी, सारी भावनाएं, सारे मूर्त-अमूर्त भाव नष्ट कर देता है. ऐसा लगता है वह भेड़िये से नहीं भाग रहा  बल्कि बैल, नटनियां और पिता को  भेड़ियों के बीच छोड़कर भाग रहा है. क्योंकि यह उसका अपना रचा दर्शन है. वह अपनी नियति को बैल, नटनियों और पिता की नियति से जोड़कर नहीं देखता. यही उसका खतरा है जिसे वह उठाना नहीं चाहता. वह दुनियावी प्रतिकूलताओं के खिलाफ एक वर्गीकरण रचता है. यह उसका श्रेष्ठि भाव है. जब तक वह बैल को गाड़ी भागने के काम का समझता है,  नटनियों को बेचे जाने के मसरफ की समझता है और पिता को हंसोड़ समझता वह अपने को केन्द्रीय इकाई मानकर दुनिया को झेलता है और खतरे से घिरा है. इसलिए वह या फिर उसके पिता अपनी स्थिति की भी सही समझ विकसित नहीं कर पाते. बड़े मियां अवश भाव से स्वीकारते हैं, “भीख मांग कर खाना बंजारों का दीन है हम रईस बनने चले थे.” इस चिंता में ग्वालियर की उन गदबदी नटनियों की कोई चिंता नहीं है ‘जो पंजाब में खूब बिक जाती हैं’. यह संवेदना का एक ‘क्लोज सर्किट’ है जो वर्गीय भिन्नता पर आधारित समाज की अधिरचना में मदद करती है. जहां हम जिस व्यवस्था को झेलते हैं उसे पोषित भी करते हैं.

पर कहानी यह साफ-साफ कहती है कि जब तक खारे का पिता अपनी नियति को  भेड़ियों के बीच फेंक दिये गये बैल और नटनियों की स्थिति से नहीं जोड़ता प्रतिकूलताओं का अंत नहीं होता. यह पिता की स्थिति का नटनियों की स्थिति से एकाकार हो जाना ही व्यक्ति के समूह में बदलने की प्रक्रिया की भूमि है. जिसे शुकदेव सिंह संज्ञा के नामिक रूपांतरण या तत्सम से तद्भव में बदल जाने की क्रिया कहते हैं. इफ्तखार अपना सब कुछ खोने के  बाद खारु में  बदल जाता है.  यह उसकी उस  छद्म  वैयक्तिक आइडेंटिटी का अंत है जिससे वह अब तक घिरा था. वह अब एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक इच्छा रह गया है जिससे उसकी सामूहिकता अभिव्यक्त होती है. दूसरे ही साल उसने साठ और भेड़िये मारे. इसके पीछे कोई रईस बनने की कथा नहीं थी न ही खुद को बचाने का संघर्ष वरन् यह उसकी सामूहिक स्मृति थी जो उसे  भेड़िये के खिलाफ करती थी. इस कहानी से यह समझा जा सकता है कि एक झुके आदमी के सीधा खड़ा होने की प्रक्रिया किस-किस मुकाम से गुजरती है.*

 

(* भेड़िये पर यह टिप्पणी डा. शुकदेव सिंह की ‘हंस, मई 1991 में प्रकाशित टिप्पणी “नयी कहानी की पहली कृति भेड़िये‘ ” से आरंभ बहस के क्रम में बीच बहस मेंहंस सितंबर,1991 में “मनुष्य की नियति का समय” शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और चर्चित रही थी. हंस के नवंबर, 1991 अंक में उस बहस की समापन टिप्पणी  “भेड़िये और भेड़िये” में डा. शुकदेव सिंह ने इस टिप्पणी की खास तौर पर चर्चा की थी और इसे महत्वपूर्ण माना था. बाद में यह टिप्पणी इसी रूप में ‘संदर्श के भुवनेश्वर पर केंद्रित अंक (अतिथि संपादक- चन्द्रमोहन दिनेश) में हंस से साभार प्रकाशित हुई थी.)

 

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 11) (पूर्व से आगे)

भुवनेश्वर की भेड़िये कहानी को वहां से समझा जाना  चाहिए जहां यह मनुष्य की नियति के समय को पकड़ने के क्रम में वैयक्तिक त्रासदी को मानवीय महात्रास में बदल देती है.  इफ्तखार के बहाने एक पीढ़ी या कहिये एक वर्ग के उस जीवन दर्शन को समझा जा सकता है जिससे वह अपनी नियति को उस समूह की नियति से अलग कर लेता है जो समान रूप से उसकी भी है. इस तरह वह एक अंतर्विभाजन रचता है और चीजों की प्राथमिकता उनकी उपयोगिता से तय करता है. यहीं से कुछ को कुछ से कमतर और कुछ को कुछ से बेहतर समझने की मानसिकता जन्म लेती है जिसके अधीन वह टिप्पणी करता है- पूरे बंजारों में उसका गड्डा अफसर था. यह एक असमानता का श्रेष्ठवादी दर्शन है जहां भेड़िये के खिलाफ लड़ाई को वह अपने बचे रहने की जद्दोजहद से जोड़ता है. तब उसे बैल उतने ही चाहिए जो गाड़ी दौड़ा ले जा सकें, नटनियां तभी तक जब तक वह गाड़ी पर बोझ न हों. यहीं कहीं वह उस प्रेम को नकारता है जिसे उसने एक क्षण बचा रखा था और बादी के बदले दूसरी  नटनियां को कूदने के लिये कहा था. यह एक किस्म की प्रतिहिंसा थी जो हिंसा को जन्म देती है. वह प्रेम को उसके सिरे से नकारने की चेष्टा करता है, “तुम खुद कूद पड़ोगी या मैं तुम्हें धकेल दूं.” और नटनियां उसी तर्ज पर चांदी की नथ उतार कर बाहों से आंखें बंद किये कूद जाती है. दरअसल यह प्रेम का वह ठहरा हुआ खास क्षण है जो इस नष्ट होते समय में बचा है. इफ्तखार को शायद शंका होती है कि बादी को वह कूदने के लिये नहीं कह सकेगा या शायद बादी ही उस पर भरोसा किये हो कि वह उसे बचा लेगा. इस तरह प्रेम उसके अन्दर की कमजोरी बन जाता है जो उसके अपने होने की शर्त  के विरुद्ध जाता  है. वह इससे निजात पाने के लिये अपनी झिझक के ऊपर यह कहने का साहस करता है, “तुम खुद कूद पड़ोगी या ….” यह एक क्रूर किस्म का व्यक्तिवाद है. बादी इसका प्रत्युत्तर है. वह चांदी की नथ उतारकर उसके हाथों में दे देती है जैसे आभास दे रही हो कि वह इसी के लिये रुकी थी. इस तरह वह अपने अन्दर के प्रेम का अंत करती है और बाहों से आंखें बंद किये अपनी नियति को स्वीकृत करती है. वह इफ्तखार के पिता की तरह कोई निर्देश नहीं देती कि वह उसके मरने के बाद उसके जूते नहीं पहने यद्यपि वो नये हैं. बादी का यह कूद पड़ना रीतिकालीन प्रेम के उत्सर्ग की नैतिकता नहीं रचता है. बल्कि एक झटके से वह अपनी उस स्थिति का संकेत करती है जो उस वक्त उसकी है और जिस असमान नैतिकता ने प्रेम का अंत कर दिया है जैसे प्रेम था ही नहीं.

…पर नियंता होने के दंभ ओढ़े इफ्तखार अपनी नियति को स्वीकार नहीं करता, वह अपने को ‘एलियनेट’ करता है. धीरे-धीरे वह सबको अपने से काटता है और एक खोखला आश्वासन ओढ़े रहता है कि अगर जिन्दा रहा तो  मैं एक-एक  भेड़िया काट डालूंगा. यह उसका आत्मस्वीकार है कि सारा व्यापार मात्र उसके जिन्दा रहने के लिये है. इफ्तखार कूद पड़ता है कि उसकी जिंदगी थोड़ी है. वह अपने अस्तित्व को ‘डाइल्यूट’ कर जिंदगी को एक यूनिट बनाता है. और मृत्यु को विवश अंगीकार करता है क्योंकि उसकी जिंदगी अपने बेटे की जिंदगी से ‘श्रेष्ठ’ नहीं है. वह अपने रचे दर्शन से अपनी स्थिति को परिभाषित करता है और पाता है. यही वह क्षण है जहां आप त्रास रचते भी हैं और उसमें शामिल भी होते हैं. धीरे-धीरे वह सारा अंतर मिट जाता है जो आपमें था, जो आपमें नहीं है. इफ्तखार के पिता में जीने का मोह था और बहाना भी. वह बुढ़ापे में बड़ा हंसोड़ हो गया था. वह अपने भाव की दुनिया रचता है – मारते-मरते मैं कह चलूंगा खारे-सा-खरा कोई निशानेबाज नहीं है. वह अपने जूते को लेकर कहता है, अगर मैं जिन्दा रहता तो दस साल और पहनता. इस तरह दस साल वह संबंध  और रहता जो खरे और उसके बाप के बीच था. लेकिन इफ्तखार के पिता ने खुद को न्यूनीकृत कर लिया.

(आगामी पोस्ट में महान कथाकार भुवनेश्वर की महत्वपूर्ण कहानी भेड़िये पर चर्चा जारी)

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