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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 23) (समापन कड़ी,  पूर्व से आगे)

देवेन्द्र चौबे  की दूसरा आदमी (नवभारत  टाइम्सदिल्ली  6 अक्टूबर  1991) में अकेली पड़ती घुटती  औरत है. नरेंद्र नागदेव की शीशा लग चुका है (जनसत्ता, 21 जुलाई,  1991) में बदलते वक्त की ‘असुरक्षा’  से घिरा व्यक्ति पारदर्शी आवरण की ‘सुरक्षा’ तलाशता है. खिजाब (जनसत्ता, 28 जुलाई 1991) में अलका सरावगी लिखती हैं, “दमयंती जी ने प्रेम और स्वतंत्रता में स्वतंत्र रहने का चुनाव कर लिया है कि प्रेम सारी सहूलियतें और सुरक्षाएं भले ही दे सकता है पर स्वतंत्रता छीन लेता है.” ऐसे में यह सहज ही सवाल उठता है कि क्यों अधिकांश लेखिकाएं अपनी बात नारी मुक्ति बनाम नारी चेतना की बहस से ही आरम्भ करती  हैं और कहानी अगर इस स्वतंत्रता के चुनाव को सनक भरे अस्त्तित्व में बदल देती है तो इससे क्या समझा जाये?  ज्योत्सना मिलन की पैर (संडे आब्जर्वर, 26 मई 1991) अच्छी कहानी है और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण.

विजय की तैयारी (मुहिम, सितंबर 1991) बिना किसी पूर्व तैयारी की लिखी रचना है जो हमारे उलझन भरे समय को सरल समीकरण में बदलने की चेष्टा करती है. जयनंदन अपनी कहानी छठतलैया  (मुहिम, सितंबर 1991)  में एक दुर्लभ किस्म का साम्प्रदायिक सदभाव रचते हैं. वासुदेव की प्रतीक्षा (मुहिम, सितंबर 1991)  मरणासन्न पिता की मृत्यु का प्रार्थनागीत है जो एक भौतिक विराग की संसृति करता है. और यह बात कई बार दुहराई गयी है. वलेनतीन रस्पुतीन (1937) की आख़री घड़ी से लेकर रामधारी सिंह दिवाकर की शोकपर्व (हंस) तक. हा धिक्, यह सार्वभौमिक प्रतीक्षा! मुहिम के पहले अंक में नारायण सिंह की कहानी स्त्रीपर्व स्त्री को उसकी गरिमा में स्थापित करती है. देवेन्द्र की बंटवारा (मुहिम-1) आंचलिक  यथार्थ की कहानी है. चंद्रकान्त राय की उमरकैद (मुहिम-1) यथार्थ को विभिन्न समय-कलाओं में पकड़ती हुई महत्वपूर्ण रचना बन जाती है. अकिंचन की कहानी सुग्गा भाग गया (रेल भारती, मार्च 1991) में पारिवारिक भावुकता अपनी प्रतीक योजना में पिछड़ जाती है. अमरेन्द्र मिश्र की टेलीफोन  (गूंज, अक्टूबर-दिसंबर 1991) में कहानी की तरह कहानीकार को अपना पक्ष पता नहीं है. प्रह्लाद श्रीमाली की कहानी दीवारें और आदमी  (मधुमती, अगस्त 1991) नये तरीके से लिखी गयी है. हनुमान दीक्षित की खाली हाथ  (मधुमती, अगस्त 1991)  आतंकवाद का विरोध करती है. सुरेन्द्र तिवारी की उसका साथ (भाषा, मार्च 1991) सम्भावना के बावजूद कहानी होने से चुकती है.

राजाराम सिंह की कहानी अंत्योदय (कतार-12) एक व्यंग्य की तरह हावी होती है पर कुछ नया नहीं रचती है. राजाराम रजक की टेनिया (कतार-12) में केवल एक सत्य है और सारी कहानी उसे सिद्ध करती है. अरविन्द कुमार की कहानी नइकी भौजी (कतार-12) में मासूमियत से उत्पन्न रुमानियत मासूमियत को नष्ट कर देती है. धनेश दत्त पाण्डेय की करवट (कतार-12) मनुष्य के शोषण और उसके इस्तेमाल की कहानी है. समकालीन परिभाषा -6 में श्याम अविनाश की हाथखुर्शीद अकरम  की उमस और जेब अख्तर की ग्राफ नाराज-कहानी है जो हमारी नाराजी को व्यवस्था-विरोध में दर्ज करती है. सूरज प्रकाश की बाजीगर (संभव-7) जीवन के नाटक में  विरोध को बाजीगरी की तरह सहज  बनाना चाहती है. जवाहर सिंह की कफन की चिंता  (संभव -8,9,10) यथार्थ के भयानक होते जाने की खबर देती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की जी. डी. उर्फ गरीब दास (संभव -8,9,10) में भाषा और शिल्प का बेहतर प्रयोग कहानी को चुस्त बनाता है. कुंदन सिंह परिहार की अपराध  (साम्य -17) कहानी का अंत प्रभावी है.

सुधाकर की जुबेदा का गुस्सा (संवेद– 1) एक छोटी पर अच्छी कहानी है. शब्दों की सचेत मितव्ययिता मन को बेधती है पर अंत में जुबेदा का तुतलाकर बोलना खरता है. सच को कहने के लिए मासूमियत के सहारे की  जरुरत नहीं होनी चाहिए. “इंसान चाहे तो कम-से-कम चीजों से भी अपना कम चला सकता है, ” सरफराज द्वारा नियति के इस स्वीकार को जुबेदा साइकिल की मांग कर तोड़ती है तो लगता है जैसे एक सन्नाटी संवादहीनता टूटती है. चंद्रमोहन प्रधान की खटमल (संवेद– 1) में खटमल को भी न मारनेवाले मंत्री  हुलास सिंह अपने अत्याचारी भाईयों को जिस तरह पिटवाते है वह फ़िल्मी रुमानियत के हिसाब से ही अच्छी लग सकती है. वैसे इस कहानी में ‘हवेली’ शब्द का अच्छा प्रयोग हुआ है जैसे, “हवेली को मारा कम घसीटा अधिक गया.” शिव कुमार शिव की शताब्दी का सच (संवेद– 1) भागते हुए शहर भागलपुर के आतंक की कथा है. कहा जा सकता है कि ‘संवेद‘ पत्रिका अपने पहले अंक से उम्मीद जगाती है और रचनात्मक नैतिकता का पूरी जिम्मेवारी से निर्वाह करती है.

1992 के उत्तरार्द्ध में आयी, खासकर वर्तमान साहित्य कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता- 1991 में पुरस्कृत कहानियाँ हिंदी कथा लेखन के नये रुझान का संकेत देती है. चंदन प्रसाद सिंह की स्कूपविनोद अनुपम की आयरन , फूलचंद गुप्ता की प्रायश्चित नहीं प्रतिशोधडा. ईश्वर दत्त वर्मा की धर्मयुद्ध जैसी कहानियाँ यथार्थ को बारीक ‘विट’ के सहारे  पकडती है और यह  शायद हिंदी कहानी में एक तार्किक कथात्मकता की शुरुआत है जो विशुद्ध गल्पवाद  से भिन्न है. कारखाना के नये अंक में चंद्रकांत राय की जूते जादुई यथार्थवादी कहानी होते हुए भी जमीनी यथार्थ से किस तरह जुडी रहती है यह देखना महत्वपूर्ण है. इनके आलावा अन्य उल्लेखनीय कहानियों में ना सम जियत न मुंअले माहीं (प्रकाश  उदय), सेवड़ी रोटियां और जले आलू (हरि भटनागर), कर्मयोग (अब्दुल बिस्मिल्लाह), उपचार (गोविन्द मिश्र) आदि का नाम लिया जा सकता है पर इनकी चर्चा फिर कभी.

संभावना / राकेश रोहित

 …तो ऐसा था हिंदी कहानी का एक संभावनापूर्ण साल!

समाप्त

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 19) (पूर्व से आगे)

आने वाले समय के तनाव को शिद्दत से महसूसने वाले रचनाकार के रूप में विनोद अनुपम का नाम लिया जाना चाहिए. उनकी पहली कहानी स्वप्न (सारिका) में आयी थी जो राजनीति के सीमान्त की ओर इशारा करती, आज की स्थितियों पर बहुत सटीक रचना है.  उनकी नयी कहानी  शापित यक्ष,  वर्तमान साहित्य  पुरस्कार अंक की   श्रेष्ठ कहानी है. यह अपनी शीर्षक संकल्पना में परंपरा के मिथ  का बहुत सजग इस्तेमाल करती है  और समूची कहानी उसका निर्वहन करती है. इसके अलावा वर्तमान   साहित्य में निषेध  (नारायण सिंह),  माफ करो वासुदेव  (वही),   मदार के फूल  (अनन्त कुमार सिंह),   बांस का किला  (नर्मदेश्वर),   सबसे बड़ी छलांग  (रामस्वरूप अणखी),  अपूर्व भोज (रमा सिंह),  प्रतिहिंसा (राणा प्रताप),  संशय की एक रात (कृष्ण मोहन झा) आदि कहानियाँ अपने महत्व में पठनीय हैं. सिम्मी हर्षिता  की कहानी इस तरह की बातें (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991)  में जिस  व्यवस्था  से  मुक्ति  की  कोशिश है  उसके विरुद्ध  किसी  चेतना  का विकास कहानी नहीं करती है.  प्रेम रंजन अनिमेष की ऐसी जिद क्या (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991) में आत्मीयता की जो प्रतीक्षा है वह हिंदी में बूढ़ी काकी (प्रेमचंद) जैसी कहानियों के सिवा दुर्लभ है.

 मध्यवर्गीय आत्म-रति को स्थापित करती सूरज प्रकाश की कहानी उर्फ चंदरकला  जैसी कहानी का दो पत्रिकाओं  वर्तमान साहित्य (नवंबर 1991) तथा संबोधन-91 में प्रकाशन संपादकीय नैतिकता पर प्रश्न लगाता है. सूरज प्रकाश जी की ही लिखी टिप्पणी “अश्लीलता के बहाने कुछ नोट्स” (हंस, जून 1991) के संदर्भ  में ही सवाल उठता है  कि अगर उनका आग्रह चंदरकला को  ‘इरोटिक’  न माने जाने का है तो क्या यह उनके ही शब्दों में एक वर्ग को पशु करार किये जाने की कोशिश नहीं है.  मैनेजर पांडेय  ने अपने आलेख “यह कछुआ धर्म अभी और कब तक” (हंस, फरवरी 1991) में लिखा है – “व्यवस्था के शील पर चोट करने के लिए अश्लीलता हथौड़े की तरह काम करती है.” अगर  सूरज प्रकाश की कहानी व्यवस्था के शील पर चोट नहीं करती तो फिर यह अश्लील क्यों है?  रघुनंदन त्रिवेदी की खोई हुई एक चीज (संबोधन-91) अपनी तलाश में शामिल करती है तो यह एक बड़ी बात है. रूप सिंह चंदेल की चेहरे (संबोधन-91) में शैक्षणिक संस्थानों का वह चेहरा सामने आता है जहां एक सहज व्यक्ति अपने को इस्तेमाल किये जाने और अंत में मोहभंग को स्वीकारने के लिए विवश है.

हरी घास की चादर

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 18) (पूर्व से आगे)

सुरेश कांटक की कहानी धर्म संकट (हंस, अगस्त 1991) में अवधेश  का संकट  आज के शुद्धतावादी हिंदी कथाकार का संकट है जो अपनी वैचारिकता से न तो किसी नैतिकतावादी संबंध को ‘जस्टीफाई’ करने की स्थिति में है और न ही उसके पास किसी भौतिकतावादी संबंध की दैहिकता को स्वीकार करने का साहस है. वह इसके मध्य फंसा है जैसे उसकी कहानी. रंजन जैदी की कहानी तब और अब (इंद्रप्रस्थ  भारती, मार्च 1991) भी इसी का उदाहरण है, जहाँ लेखक फ्रायड को पढ़ने के बाद भी नियतिवादी आग्रह से मुक्त नहीं है. प्राइवेट लाइफ  की गीतांजली श्री  की  दहलीज (हंस, अगस्त 1991) में भाषा की नफासत पहले चौंकाती है प्रभावित बाद में करती है. मृणाल पांडे की कहानी  हिर्दा  मेयो का मंझला (हंस, अक्टूबर 1991), शशांक की कहानी सुदिन (हंस, वही) और गुलज़ार की कहानी सनसेट बुलेवार (हंस, वही) अपनी पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है और अपेक्षा अधूरी रह जाती  है. पर इसके बावजूद गुलजार की सनसेट बुलेवार में चारुलता का अपने मकान के प्रति मोह अपने समय के विरुद्ध कुछ जो व्यक्तिगत है, प्रिय है को बचा लेने की इच्छा है और समय की नृशंसता  जिसकी अस्ति का अंत कर देती है. सी. भास्कर राव की आतंक (हंस, वही) अपनी कथात्मकता और उसमें अंतर्निहित आस्था के कारण प्रभावी है. हवन (गंगा) से सुपरिचित हुईं सुषम बेदी की कहानी पार्क में (हंस, वही) आयी है जो अंत में इराक-अमरीका युद्ध में एक मनुष्य के पक्ष के अकेले पड़ते जाने को पकड़ती है. विजय प्रताप की  कहानी वैक्यूम (हंस, वही) वैज्ञानिक विजन का उपयोग करते हुए प्रायोगिक और सैद्धांतिक के अंतर्विरोध को छूती है और इस अंत तक पहुंचना कि कोई सिद्धांत निरपेक्ष नहीं होता कि बचपन में जो शिक्षा हमें दी जाती है उसे अमल में लाने के लिए वैक्यूम जैसी किसी विशेष स्थिति की जरूरत होती है, सचमुच अपनी सीमाओं में हमें परेशान करता है. असलम की यप-यप-यप्पी (हंस, नवम्बर 1991)  मूल्यों के बदलाव और धीरे-धीरे उसमें अमानवीयता के सहज शुमार का ग्राफ है. शफी जावेद की कहानी अजनबी (हंस, वही) की शांत भाषा का तनाव महत्वपूर्ण है. एक सवाल जो कहानी उभारती है -क्या औरत से शादी करने के लिए उसके धार्मिक विश्वास को भी अपनाना जरूरी है? आनन्द बहादुर की कबाब (हंस, दिसंबर 1991) खंडश: प्रभाव  में एक अच्छी कहानी लगती है पर विचार के रूप में यह निकट-दृष्टि से मुक्त नहीं हो पाती है. और यह आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि धर्म को लेकर जिस संक्रमणशील  दौर में हम रह रहे हैं वहां अपने नजरिये को ‘एबसोल्यूट’ रूप में विकसित कर पाना बहुत कठिन है. ऐसा लगता है इस कहानी में लेखक अजाने में उस स्थिति को स्वीकृत कर रहा है जिसमें दबावों के बीच एक आदमी अपनी मान्यताओं के साथ सुरक्षित नहीं है.

सूर्यास्त/ अन्विता के.

सूर्यास्त/ अन्विता के.

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(आज की हिंदी कहानी में छात्र कहां हैं ?)                        

– राकेश रोहित

(भाग- 17) (पूर्व से आगे)

राजेन्द्र चंद्रकांत राय की पौरुष (हंस, जुलाई 1991) के बहाने बटरोही ‘हंस‘ का विरोध ‘नवभारत टाइम्स‘ में कर चुके हैं और राजेंद्र चंद्रकांत राय  अपना बचाव भी. राजेंद्र चंद्रकांत राय का यह कहना बिल्कुल सही है कि कहानी पर अपने कलीग (colleague) की टिप्पणी उद्धृत करने के के बजाय बटरोही खुद टिप्पणी क्यों नहीं करते? बटरोही जी समर्थ आलोचक हैं और उन्हें ऐसी सुविधा की जरुरत कतई नहीं होनी चाहिए. राजेंद्र चंद्रकांत राय  की कहानी पौरुष और औरत का घोड़ा (वर्तमान साहित्य, सितंबर 1991) शिक्षा संस्थानों के शैक्षणिक स्टाफ उर्फ शिक्षकों के आपस की रुमानियत रहित, ‘शेष-समय-प्रेम’ की कहानी है. इस संदर्भ में एक दिलचस्प बात सामने आती है वह यह कि कम-से-कम हमारे यहां छात्र अब कालेज के जरूरी उपकरणों में शामिल नहीं हैं. और यह अकारण नहीं है अगर कॉलेज आधारित कहानियों में छात्र अब उपस्थित नजर नहीं आते हैं. वैसे वे अपनी सामूहिकता में अपना मोर्चा (काशीनाथ सिंह) जैसे उपन्यासों में भले मिल जाते हों पर वैयक्तिकता को लेकर जिस तरह कॉलेज जीवन में पनपने वाले प्रेम संबंधों का चित्रण रांगेय राघव ने अपने पहले उपन्यास घरौंदा में किया वह अब दुर्लभ सी चीज हो गयी है. आज के लेखकों को कॉलेज पर कुछ लिखना हो तो जाहिर है उन्हें कॉलेज के अध्यापकों और अध्यापिकाओं के वाद-विवाद और प्रेमवाद से ही काम चलाना पड़ेगा. पर असली सवाल तो यह है कि छात्र अगर स्कूल-कॉलेजों में नहीं हैं तो वे कहां हैं? सड़कों पर तो वे हैं नहीं! खेत-खलिहानों, जंगल-मैदानों में तो कदापि नहीं. नाव और रिक्शा तो आउट डेटेड चीज है और रेल बोरियत भरी! आज की हिंदी कहानी में छात्र बसों में हैं. बस!

यहीं-कहीं है प्रेम!

यहीं-कहीं है प्रेम!

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 16) (पूर्व से आगे)

चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी हिंगवा घाट में पानी रेहंस, मई 1987)  आजादी के बाद के हमारे प्रांतीय यथार्थ की एक विशिष्ट रचना है. इसमें जायसवाल जी ने ढह रहे सामंतवाद और पनप रहे नव्यतम राजनीतिक स्टंटों व छद्मों की गिरफ्त में फंसे भनटा और उसके समाज के दबावों को सामने रखा है. वर्तमान समय में भनटा जैसे लोगों की भोली आशाएं छली जाती रही हैं और इस छले जाने को भनटा अंत में स्वीकार भी करता है. पर अगर भनटा में स्थानीय स्तर पर सुरो बाबू से मुक्त होने की किसी चेतना का विस्तार नहीं हो रहा और भनटा खुद को शोषण की परंपरा में शामिल किये जाने को अहसान के साथ स्वीकारता है तो लगता है इनके यहां कहानियां अपनी अतिस्वाभाविकता में विचार को ‘ओवरटेक’ कर जाती हैं और इस तरह वे यथार्थ का अतिक्रमण करने की कोशिश में कोई समांतर यथार्थ नहीं रच पाती हैं. इस वर्ष चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी अभागा (हंस, अप्रैल 1991) आयी. अपराधआपरेशन जोनाकीदेवी सिंह कौन जैसी कहानियों के एक अंतराल के बाद इस कहानी (अभागा) को एक घटना के रूप में होना चाहिए क्योंकि यह कहानी परिवर्तन की मध्यवर्गीय इच्छा की शिनाख्त करना चाहती है. पर इसमें पूर्व पीढ़ी के मध्यकालीन अभियानों में शामिल होने की अभौतिक इच्छा का आनंद है और इस आनंद में लेखक इतना डूबता है कि वह उस पीढ़ी, जो यथास्थिति को पोषित करती है, को एक मजाकिये चरित्र में बदल देता है और नयी पीढ़ी के जीवन-विचार का संकट अनछुआ रह जाता है. इन सबके बावजूद चन्द्र किशोर जायसवाल की भाषा पर अद्भुत पकड़ यथार्थ के डीटेल्स को पकड़ने में नहीं चूकती है और कथात्मकता का एक सुन्दर वितान रचा जाता है.

विद्यासागर नौटियाल की कहानी फट जा पंचधार (हंस, अप्रैल 1991) को पढ़ना एक अनुभव से गुजरना है. स्त्री की तयशुदा नियति को अपनी मौलिक चेतना से नकारती रक्खी पंचधार के फट जाने की इच्छा के साथ अविस्मरणीय ढंग से उपस्थित होती है. संस्मरण की तरह लिखी गयी जितेन्द्र की कहानी नंद के लाल (हंस, मई 1991) अपने समय के सूचक के रूप में याद रखी जानी चाहिये. जितेन ठाकुर की वो एक दिन (हंस, जून 1991) बाल-कथा सी याद आती है और यह हिन्दी कहानी के लिए एक अच्छी बात भी हो सकती है. जयनंदन की गिद्ध झपट्टा (हंस, जून 1991) का सुन्दर विकास एक तय अंत तक पहुँचता है. पिंटी का साबुन के संजय खाती की पुतला (हंस, जुलाई 1991) यथार्थ की संरचना को उसके सही और समूचे स्वरूप में पाती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि खाड़ी युद्ध पर लिखी यह कहानी साम्प्रदायिकता की भी शिनाख्त करती है. वे कथाकार जिनकी समझ साम्प्रदायिकता और उसके विरुद्ध रचनात्मक हस्तक्षेप को लेकर गड्ड-मड्ड है, इससे संकेत ग्रहण कर सकते हैं. इसी वैज्ञानिक समझ का उपयोग विजय ने अपनी कहानी गोह (हंस, जुलाई 1991) में किया है जबकि गिरिराज किशोर की गुमचोट (हंस, जुलाई 1991) में यह ज्यादा साफ़ नहीं है. गोह में कासिम का वैचारिक सामूहिकी से एलियनेट कर दिया जाना विचार पर आज का सबसे बड़ा संकट है.

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 15) (पूर्व से आगे)

विजय प्रताप की कहानी खराब लड़कीहंस, जनवरी 1991) को मूल्य के अंत को सार्थक व्यावहारिकता के रूप में स्वीकार लिए जाने की कोशिश के रूप में समझा जा रहा है पर यह कहानी उतनी सहज नहीं कि इस मुद्दे पर आप इतनी आसानी से चिढ़ जाएं. दरअसल यह परिवार में रिश्तों को तार्किक ढंग से प्राप्त करने की वह  ‘एप्रोच’ है जहां नारी, प्रेम के अंत के इस समय में अपने को मुक्त कर सकती है. सुथि द्वारा आत्म-समर्थित जीवनशैली को पाने की यह प्रक्रिया कितनी सहज है इसका संकेत पिता और बेटी के बीच चाकू को उठाकर फेंक दिये जाने में मिलता है. इस कहानी से समय के तनाव को ‘फीमेल नेरेशन’ में आप उसी तरह पाते हैं जिस तरह अखिलेश की चिट्ठीहंस, अगस्त 1989) से ‘मेल नेरेशन’ में. श्यामा की रोटी (अशोक राही, वही) एक अच्छी प्रेम कहानी है जिसमें पगली श्यामा उस प्रेम की प्रतीक है, अनु द्वारा रोटी दिये जाने के बाद भी जिसका अंत इस दौर की नियति है. ‘नैरेटर’ (narrator) का कहानी के मध्य सीधा संवाद करना इसे रूमानी होने से बचाता है. लवलीन की  कुंडली ( वही, फरवरी १९९१) आफिसों में कम कर रही, और ‘मेल कमेन्ट’ से जूझती स्त्री की त्रासदी का बयान तो है पर इसे वैचारिकता को लेकर और सजग होना चाहिए था. सुभाष पन् की पहाड़ की सुबह (वही, मार्च 1991) लोककथा का गंभीर आनंद देती है. नरेंद्र नागदेव की लिस्ट ( वही) बेरोजगारी की स्थितियों पर लिखी अच्छी कहानी तो है पर इससे एक महत्वपूर्ण संकेत लिया जा सकता है कि यह वह कहानी है जो अनुभव को यथार्थ में बदलने की हडबड़ी से उपजती है. इससे अलग यहां यह जिक्र किया जाना चाहिए कि फैंटेसी के इसी उपयोग से भाईयों, मुझे जड़ की तलाश है (सत्यनारायणहंस जनवरी 1987) जैसी उत्कृष्ट रचना संभव हो सकी है.

कहा जाना चाहिए  हिन्दी कहानी में एक शहर होता है जो गांव सा दीखता है, एक गांव होता है जो शहर सा दीखता है  और एक बिहार होता है जो किसी सा नहीं दीखता है. वैसे बिहार वाले चाहें तो इस पर गर्व कर सकते है कि इस ‘बिहार’ का विकास हिन्दी कहानी में बिहार से बाहर भी बहुत हुआ और नकली जनवाद का आतंक रचने में ये कहानियां अव्वल रहीं. अब सुधीश पचौरी भले चिंता करें कि बिहार की कहानी में भागलपुर की खबर क्यों नहीं है? मुझे लगता है कि बिहार की कहानी का जो मूल संकट है वह यह कि यह न केवल अपने प्रान्त के परिवर्तनशील यथार्थ की उपेक्षा करती वरन् उससे काफी हद तक अनभिज्ञ भी है.  इतिहास- बोध जैसी चीज का यहां बिल्कुल अभाव है और इसलिए यह अपने समय में अपनी अजनबीयत को पकड़ पाने में पिछड़ जाती है और अक्सर यथार्थ को एकांगी नजरिये से देखती है. इस ‘टोटल कंसेप्शन’ के अभाव के बाद बिहार-कहानी में विजन का विकास हो पाना तो मुमकिन न ही  था, पर जैसा कि हिन्दी कहानी में होता है वह भाषिक क्षमता से विजन की अनुपस्थिति को छुपाती है और गाहे-बगाहे इसी प्रक्रिया से विजन को पाती है, वह भाषिक क्षमता प्राप्त करने में भी बिहार-कहानी अक्सर चूकती है. जबकि बिहार में कई सशक्त गद्य परंपराओं- वह चाहे  शिवपूजन सहायरामधारी सिंह दिनकररामवृक्ष बेनीपुरीराजा राधिका रमण प्रसाद सिंह का हो या फिर आंचलिकता का मिथ गढ़ने वाले ‘रेणु‘ का- लंबा इतिहास रहा है. ऐसे में आज यह देखना हैरत भरा है कि बिहार के कहानीकारों की  कोई ऐसी व्यक्तिगत पहचान नहीं है कि आप उन्हें कुछ मानक आधारों पर अलग कर सकें. इस सिलसिले में शायद एक नाम है जिसे विचार में अवश्य रखा जाना चाहिए, वह है- चन्द्र किशोर जायसवाल. इन्होने हिन्दी कहानी में जो खास चीज विकसित की है वह है कथा के समांतर सहज व्यंग्य की, सहायक भाव की तरह, उपस्थिति जो बिना किसी बड़बोलेपन के मनुष्य के अंतर के छद्म पर आघात करती है. और यह इसके बावजूद कि इनके यहां आंचलिकता न केवल आभिजात्य है, वरन् कथात्मकता की ‘डिमांड’ भी ज्यादा है.

(आगामी पोस्ट में चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग- 14) (पूर्व से आगे)

हमारी हिंदी कहानी  लेखकीय संवेदन क्षमता की श्रेष्ठता और पाठकीय संवेदन योग्यता के प्रति संदेह से आक्रांत रहती है और इसलिए हमारी कहानी में ‘स्पेस’ का अभाव रहता है. वही सच है जो कहानी में है और वही सारा सच है, कुछ ऐसा ही भाव आज की कहानी प्रस्तुत करती है. और इसलिए हिंदी कहानी में अनुपस्थित-पात्र योजना का अभाव है. यह चीज फणीश्वर नाथ रेणुमें देखी जा सकती है. उनके यहां अनुपस्थित पात्र अक्सर कहानी को ‘स्पेस’ और ‘डाइमेंशन’ देते हैं. प्रकाश कांत की  अमर घर चल (हंस, सितंबर 1991) का जिक्र इसलिए किया जाना चाहिए कि यह उस ‘टेकनीक’ को अपनाती है. अमर घर चल में केवल वह सच ही कहानी नहीं है जो बच्चे के प्रति आपके मासूम चिंताओं से रचा जाता है, बल्कि बच्चे के माध्यम से आप उस पिता के तनाव के आतंक तक पहुंचते हैं जो कहानी में अनुपस्थित है और जो आतंक बच्चे की दुनिया में रिसता हुआ बहता है. जब आप यह मान लेते हैं कि कहानी ने ‘रिलेशन’ का अंत कर दिया है कि सारे पात्र अब ‘सेपरेट यूनिट’  हैं वहां माँ, माँ नहीं है, पिता, पिता नहीं हैं और बच्चा, बच्चा नहीं है तो आप पाते हैं कि बच्चा ‘इररेशनल’ होने की हद तक ‘रिलेशन’ को ‘फाइंड’ करना चाहता है और आप एक बेचैनी से भर जाते हैं. आप उस बेचैन दुनिया में प्रवेश करते हैं, बच्चा जिससे मुक्त होना चाहता है. यह जो एक पीढ़ी को ‘एलियनेट’ कर दिये जाने वाला माहौल है, कहानी उसको पकड़ना चाहती है और एक तार्किकता से जीवन के अनुपस्थित भाव को पा लेने की इच्छा से भर जाती है.

रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी  द्वार पूजा (वर्तमान साहित्य, जुलाई 1991) पिपही बजाने वाले झमेली द्वारा सुखदेव कलक्टर की बेटी की शादी में पिपही बजाने की इच्छा की कहानी है. यह एक सामान्य इच्छा रह जाती अगर झमेली सुखदेव के बाप और उनकी बहन की शादी में पिपही बजाने की परंपरा को अपने अधिकार से न जोड़ते और साथ-साथ इस भावना से न जुड़े रहते, “दुलहिन भी सुन लेगी हमारा बाजा.” पर धीरे-धीरे कहानी में यह बात फैलती है,  “गांव वालों की कोई खास जरुरत नहीं है.” और झमेली क्या अपनी अपमानित सत्ता से बेखबर पिपही बजाने के सुख में डूबा है? नहीं, जब आप देखते हैं कि विशाल शामियाने के पीछे गोहाल में उसने अपनी मंडली रची है, अपनी एक दुनिया बनायी है जिसमें उसकी सत्ता है. वह अब विवाह की घटना से जैसे ऊपर है कि झमेली  भी यह बात बिल्कुल भूल गया है कि वह अपनी पोती की शादी में पिपही बजाने आया है. इस दुनिया में उस चमक भरी दुनिया का हस्तक्षेप भी है जब सुखदेव बाबू पंडित चुनचुन झा को शास्त्री जी के साथ बैठ जाने को कहते हैं, “गरीब पुरोहित हैं, बेचारे को कुछ दान-दक्षिणा भी मिल जायेगी.” और तब राधो सिंह पंडी जी को द्वार पूजा के लिये छोड़कर स्मृतियों के साथ जीवित दूसरी दुनिया में लौटते हैं. जहां एक संदेश पिपही से निकल कर फ़ैल रहा है, “माय हे, अब न बचत लंका— राजमंदिर चढि कागा बोले—.”

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग- 13) (पूर्व से आगे)

“आपका निर्णय आपको निर्णायित और परिभाषित करता है,” ज्यां पाल सार्त्र की इस पंक्ति से बल्लभ सिद्धार्थ अपनी कहानी अश्लील आरंभ करते हैं. ‘आपका निर्णय, जो आप सदी की उतराई में करते हैं. निर्णय वह जो भेड़िये में खारु करता है. निर्णय वह जो अश्लील में अपंग अधेड़ करता है- धीरे-धीरे सब कुछ- लड़की (नंदिनी), राजे, अपना दुःख और एकांत एक अश्लील दुनिया के हवाले करता है. “रेगिस्तान से जिन्दा बचने का एक ही उपाय होता है जैसे भी हो इसे पार किया जाए, जैसे भी हो.” रेगिस्तान- कहीं यह भेड़िये के तनाव को ही तो आज के संदर्भों में नहीं महसूसती, पर नहीं कि  भेड़िये में जो ‘रेसिस्ट’ न कर पाने की ‘योग्यता’ है वह यहां ‘रेसिस्ट’ कर पाने का ‘स्वीकार’ है. एक प्रबुद्ध पाठक ज्ञानी राम महतो (हंस, जुलाई, 1987) लिखते हैं, “इन कहानियों से होकर गुजरना एक आतंक भरे माहौल से होकर असहज एवं सचेष्ट रूप से गुजरना है.”

बल्लभ सिद्धार्थ अधेड़, लड़की और पुरुष की कहानियां श्रृंखलात्मक रूप से एक उपन्यास के लिये लिख रहे हैं और इससे कई बार पाठक भ्रमित भी होते हैं. इक्कीसवीं सदी की ओरईडन का बगीचाबिना खिड़कियों का कमराचौबीसवां नरकइतिहास का बैताल और अब फिर अश्लील पढ़ते हुए मुझे लगा बल्लभ सिद्धार्थ की यह यथार्थ की तह तक पहुंचने की जिद है जो कभी-कभी अनियंत्रित आक्रोश के रूप में भी प्रकट होती है. स्पष्टतः अगर कोई रचना इतने लंबे अंतराल तक रचनाकार को दबाव में रखती है तो यह आभास होता है कि वह इससे कितना गहरे जुड़ा है. अश्लील की जो खासियत है कि अपनी खीझ और आक्रोश को लंबे संश्लेषण के बाद यह कहानी अपनी सम्पूर्ण नियति के रूप में पा सकी है. सबसे बड़ी बात जो कहानी करती है कि वह अश्लीलता का आतंक तोड़ती है. वहां वह अश्लील नहीं है जो अनावृत है, नंगा है बल्कि वह है जिसे हम अपनी नकार में स्वीकार किये चलते हैं. जहां हां और ना करने का विकल्प शेष हो जाता है. शम्भू गुरु, जो नेता का छुटभैया संस्करण है अपनी अश्लील जिज्ञासा से ‘नंदिनी बाई, नंदिनी बाई’ पुकारता आता है और कोई सुराग न पाकर सिलाई के लिये कपड़ा और पचास रुपये एडवांस देकर चला जाता है, और जिसे लड़की झिझकते हुए और अधेड़ समझते हुए स्वीकार करते हैं. और फिर चहारदीवारी पर खड़ा होकर मकान मालिक का बेटा मोंटू किराया वसूलता है और अधेड़ उसी पचास में दस मिलाकर उसे टरकाता है. इस तरह वह लाचार समझे जाने को जीने की शर्त में शुमार कर लेता है. लगता है जैसे प्रतिकार का भी अंत हो गया कि अधेड़ ने शम्भू गुरु द्वारा लड़की की समूची देह पीने को स्वीकार कर लिया है. यहीं अश्लीलता आरंभ होती है. और आप ऐसी दुनिया जीने के लिये पाते हैं जहां राजे जीतने का भेद जानकर जुआ खेलने के लिये गुली चुराकर बेचता है और सौदेबाजी से पांच रुपये ऐंठता है. यह अश्लील दुनिया में नयी पीढ़ी के अस्तित्व का संघर्ष है. यहां अश्लील वह नहीं रह जाता है जो राजे ने किताब के दो आदिम मुद्रा में एक नग्न युग्म पर मामा और मम्मी लिखा है. अश्लील तो वह है जो बिट्टी इककीस सौ की देनदारी का परचा पुरुष को देती है और पुरुष करुण मुस्कराहट से विवाह  मंडप में पहनाये पत्नी की अंगूठी वाला हाथ आगे बढ़ाता है. यह यशपाल की फूलों का कुरता और परदा की परंपरा का सीधा विकास है. इस पर अधेड़ की टिप्पणी है,”हम किस कदर हिंसक वक्त में रह रहे हैं.”

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 12) (पूर्व से आगे)

इफ्तखार अपने सतत ‘एलियनेशन’ से कब मुक्त होता है? शुकदेव सिंह इसे ‘खत्म होती दिलचस्पियों की रफ़्तार कहते हैं पर यह शायद उतना सटीक नहीं है. क्योंकि धीरे-धीरे वह अपने इस अस्तित्ववादी दर्शन से एकाकार होता है कि दुनिया उसके लिये घूम रही है. स्वयं मात्र को बचाने के लिये सारे गृहस्थी, सारी भावनाएं, सारे मूर्त-अमूर्त भाव नष्ट कर देता है. ऐसा लगता है वह भेड़िये से नहीं भाग रहा  बल्कि बैल, नटनियां और पिता को  भेड़ियों के बीच छोड़कर भाग रहा है. क्योंकि यह उसका अपना रचा दर्शन है. वह अपनी नियति को बैल, नटनियों और पिता की नियति से जोड़कर नहीं देखता. यही उसका खतरा है जिसे वह उठाना नहीं चाहता. वह दुनियावी प्रतिकूलताओं के खिलाफ एक वर्गीकरण रचता है. यह उसका श्रेष्ठि भाव है. जब तक वह बैल को गाड़ी भागने के काम का समझता है,  नटनियों को बेचे जाने के मसरफ की समझता है और पिता को हंसोड़ समझता वह अपने को केन्द्रीय इकाई मानकर दुनिया को झेलता है और खतरे से घिरा है. इसलिए वह या फिर उसके पिता अपनी स्थिति की भी सही समझ विकसित नहीं कर पाते. बड़े मियां अवश भाव से स्वीकारते हैं, “भीख मांग कर खाना बंजारों का दीन है हम रईस बनने चले थे.” इस चिंता में ग्वालियर की उन गदबदी नटनियों की कोई चिंता नहीं है ‘जो पंजाब में खूब बिक जाती हैं’. यह संवेदना का एक ‘क्लोज सर्किट’ है जो वर्गीय भिन्नता पर आधारित समाज की अधिरचना में मदद करती है. जहां हम जिस व्यवस्था को झेलते हैं उसे पोषित भी करते हैं.

पर कहानी यह साफ-साफ कहती है कि जब तक खारे का पिता अपनी नियति को  भेड़ियों के बीच फेंक दिये गये बैल और नटनियों की स्थिति से नहीं जोड़ता प्रतिकूलताओं का अंत नहीं होता. यह पिता की स्थिति का नटनियों की स्थिति से एकाकार हो जाना ही व्यक्ति के समूह में बदलने की प्रक्रिया की भूमि है. जिसे शुकदेव सिंह संज्ञा के नामिक रूपांतरण या तत्सम से तद्भव में बदल जाने की क्रिया कहते हैं. इफ्तखार अपना सब कुछ खोने के  बाद खारु में  बदल जाता है.  यह उसकी उस  छद्म  वैयक्तिक आइडेंटिटी का अंत है जिससे वह अब तक घिरा था. वह अब एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक इच्छा रह गया है जिससे उसकी सामूहिकता अभिव्यक्त होती है. दूसरे ही साल उसने साठ और भेड़िये मारे. इसके पीछे कोई रईस बनने की कथा नहीं थी न ही खुद को बचाने का संघर्ष वरन् यह उसकी सामूहिक स्मृति थी जो उसे  भेड़िये के खिलाफ करती थी. इस कहानी से यह समझा जा सकता है कि एक झुके आदमी के सीधा खड़ा होने की प्रक्रिया किस-किस मुकाम से गुजरती है.*

 

(* भेड़िये पर यह टिप्पणी डा. शुकदेव सिंह की ‘हंस, मई 1991 में प्रकाशित टिप्पणी “नयी कहानी की पहली कृति भेड़िये‘ ” से आरंभ बहस के क्रम में बीच बहस मेंहंस सितंबर,1991 में “मनुष्य की नियति का समय” शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और चर्चित रही थी. हंस के नवंबर, 1991 अंक में उस बहस की समापन टिप्पणी  “भेड़िये और भेड़िये” में डा. शुकदेव सिंह ने इस टिप्पणी की खास तौर पर चर्चा की थी और इसे महत्वपूर्ण माना था. बाद में यह टिप्पणी इसी रूप में ‘संदर्श के भुवनेश्वर पर केंद्रित अंक (अतिथि संपादक- चन्द्रमोहन दिनेश) में हंस से साभार प्रकाशित हुई थी.)

 

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 11) (पूर्व से आगे)

भुवनेश्वर की भेड़िये कहानी को वहां से समझा जाना  चाहिए जहां यह मनुष्य की नियति के समय को पकड़ने के क्रम में वैयक्तिक त्रासदी को मानवीय महात्रास में बदल देती है.  इफ्तखार के बहाने एक पीढ़ी या कहिये एक वर्ग के उस जीवन दर्शन को समझा जा सकता है जिससे वह अपनी नियति को उस समूह की नियति से अलग कर लेता है जो समान रूप से उसकी भी है. इस तरह वह एक अंतर्विभाजन रचता है और चीजों की प्राथमिकता उनकी उपयोगिता से तय करता है. यहीं से कुछ को कुछ से कमतर और कुछ को कुछ से बेहतर समझने की मानसिकता जन्म लेती है जिसके अधीन वह टिप्पणी करता है- पूरे बंजारों में उसका गड्डा अफसर था. यह एक असमानता का श्रेष्ठवादी दर्शन है जहां भेड़िये के खिलाफ लड़ाई को वह अपने बचे रहने की जद्दोजहद से जोड़ता है. तब उसे बैल उतने ही चाहिए जो गाड़ी दौड़ा ले जा सकें, नटनियां तभी तक जब तक वह गाड़ी पर बोझ न हों. यहीं कहीं वह उस प्रेम को नकारता है जिसे उसने एक क्षण बचा रखा था और बादी के बदले दूसरी  नटनियां को कूदने के लिये कहा था. यह एक किस्म की प्रतिहिंसा थी जो हिंसा को जन्म देती है. वह प्रेम को उसके सिरे से नकारने की चेष्टा करता है, “तुम खुद कूद पड़ोगी या मैं तुम्हें धकेल दूं.” और नटनियां उसी तर्ज पर चांदी की नथ उतार कर बाहों से आंखें बंद किये कूद जाती है. दरअसल यह प्रेम का वह ठहरा हुआ खास क्षण है जो इस नष्ट होते समय में बचा है. इफ्तखार को शायद शंका होती है कि बादी को वह कूदने के लिये नहीं कह सकेगा या शायद बादी ही उस पर भरोसा किये हो कि वह उसे बचा लेगा. इस तरह प्रेम उसके अन्दर की कमजोरी बन जाता है जो उसके अपने होने की शर्त  के विरुद्ध जाता  है. वह इससे निजात पाने के लिये अपनी झिझक के ऊपर यह कहने का साहस करता है, “तुम खुद कूद पड़ोगी या ….” यह एक क्रूर किस्म का व्यक्तिवाद है. बादी इसका प्रत्युत्तर है. वह चांदी की नथ उतारकर उसके हाथों में दे देती है जैसे आभास दे रही हो कि वह इसी के लिये रुकी थी. इस तरह वह अपने अन्दर के प्रेम का अंत करती है और बाहों से आंखें बंद किये अपनी नियति को स्वीकृत करती है. वह इफ्तखार के पिता की तरह कोई निर्देश नहीं देती कि वह उसके मरने के बाद उसके जूते नहीं पहने यद्यपि वो नये हैं. बादी का यह कूद पड़ना रीतिकालीन प्रेम के उत्सर्ग की नैतिकता नहीं रचता है. बल्कि एक झटके से वह अपनी उस स्थिति का संकेत करती है जो उस वक्त उसकी है और जिस असमान नैतिकता ने प्रेम का अंत कर दिया है जैसे प्रेम था ही नहीं.

…पर नियंता होने के दंभ ओढ़े इफ्तखार अपनी नियति को स्वीकार नहीं करता, वह अपने को ‘एलियनेट’ करता है. धीरे-धीरे वह सबको अपने से काटता है और एक खोखला आश्वासन ओढ़े रहता है कि अगर जिन्दा रहा तो  मैं एक-एक  भेड़िया काट डालूंगा. यह उसका आत्मस्वीकार है कि सारा व्यापार मात्र उसके जिन्दा रहने के लिये है. इफ्तखार कूद पड़ता है कि उसकी जिंदगी थोड़ी है. वह अपने अस्तित्व को ‘डाइल्यूट’ कर जिंदगी को एक यूनिट बनाता है. और मृत्यु को विवश अंगीकार करता है क्योंकि उसकी जिंदगी अपने बेटे की जिंदगी से ‘श्रेष्ठ’ नहीं है. वह अपने रचे दर्शन से अपनी स्थिति को परिभाषित करता है और पाता है. यही वह क्षण है जहां आप त्रास रचते भी हैं और उसमें शामिल भी होते हैं. धीरे-धीरे वह सारा अंतर मिट जाता है जो आपमें था, जो आपमें नहीं है. इफ्तखार के पिता में जीने का मोह था और बहाना भी. वह बुढ़ापे में बड़ा हंसोड़ हो गया था. वह अपने भाव की दुनिया रचता है – मारते-मरते मैं कह चलूंगा खारे-सा-खरा कोई निशानेबाज नहीं है. वह अपने जूते को लेकर कहता है, अगर मैं जिन्दा रहता तो दस साल और पहनता. इस तरह दस साल वह संबंध  और रहता जो खरे और उसके बाप के बीच था. लेकिन इफ्तखार के पिता ने खुद को न्यूनीकृत कर लिया.

(आगामी पोस्ट में महान कथाकार भुवनेश्वर की महत्वपूर्ण कहानी भेड़िये पर चर्चा जारी)

…जारी

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