Tag Archive: सारिका



हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 19) (पूर्व से आगे)

आने वाले समय के तनाव को शिद्दत से महसूसने वाले रचनाकार के रूप में विनोद अनुपम का नाम लिया जाना चाहिए. उनकी पहली कहानी स्वप्न (सारिका) में आयी थी जो राजनीति के सीमान्त की ओर इशारा करती, आज की स्थितियों पर बहुत सटीक रचना है.  उनकी नयी कहानी  शापित यक्ष,  वर्तमान साहित्य  पुरस्कार अंक की   श्रेष्ठ कहानी है. यह अपनी शीर्षक संकल्पना में परंपरा के मिथ  का बहुत सजग इस्तेमाल करती है  और समूची कहानी उसका निर्वहन करती है. इसके अलावा वर्तमान   साहित्य में निषेध  (नारायण सिंह),  माफ करो वासुदेव  (वही),   मदार के फूल  (अनन्त कुमार सिंह),   बांस का किला  (नर्मदेश्वर),   सबसे बड़ी छलांग  (रामस्वरूप अणखी),  अपूर्व भोज (रमा सिंह),  प्रतिहिंसा (राणा प्रताप),  संशय की एक रात (कृष्ण मोहन झा) आदि कहानियाँ अपने महत्व में पठनीय हैं. सिम्मी हर्षिता  की कहानी इस तरह की बातें (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991)  में जिस  व्यवस्था  से  मुक्ति  की  कोशिश है  उसके विरुद्ध  किसी  चेतना  का विकास कहानी नहीं करती है.  प्रेम रंजन अनिमेष की ऐसी जिद क्या (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991) में आत्मीयता की जो प्रतीक्षा है वह हिंदी में बूढ़ी काकी (प्रेमचंद) जैसी कहानियों के सिवा दुर्लभ है.

 मध्यवर्गीय आत्म-रति को स्थापित करती सूरज प्रकाश की कहानी उर्फ चंदरकला  जैसी कहानी का दो पत्रिकाओं  वर्तमान साहित्य (नवंबर 1991) तथा संबोधन-91 में प्रकाशन संपादकीय नैतिकता पर प्रश्न लगाता है. सूरज प्रकाश जी की ही लिखी टिप्पणी “अश्लीलता के बहाने कुछ नोट्स” (हंस, जून 1991) के संदर्भ  में ही सवाल उठता है  कि अगर उनका आग्रह चंदरकला को  ‘इरोटिक’  न माने जाने का है तो क्या यह उनके ही शब्दों में एक वर्ग को पशु करार किये जाने की कोशिश नहीं है.  मैनेजर पांडेय  ने अपने आलेख “यह कछुआ धर्म अभी और कब तक” (हंस, फरवरी 1991) में लिखा है – “व्यवस्था के शील पर चोट करने के लिए अश्लीलता हथौड़े की तरह काम करती है.” अगर  सूरज प्रकाश की कहानी व्यवस्था के शील पर चोट नहीं करती तो फिर यह अश्लील क्यों है?  रघुनंदन त्रिवेदी की खोई हुई एक चीज (संबोधन-91) अपनी तलाश में शामिल करती है तो यह एक बड़ी बात है. रूप सिंह चंदेल की चेहरे (संबोधन-91) में शैक्षणिक संस्थानों का वह चेहरा सामने आता है जहां एक सहज व्यक्ति अपने को इस्तेमाल किये जाने और अंत में मोहभंग को स्वीकारने के लिए विवश है.

हरी घास की चादर

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

…जारी

Advertisements

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग -9) (पूर्व से आगे)

 

काशीनाथ सिंह की एक लुप्त होती हुई नस्ल एक खास समूह के विलुप्तीकरण की सूचना है जो समूह सामाजिकता को अपनी जीवन शैली में जोड़कर देखता है. यह कहानी उस बरदेखुआ  नस्ल के असंगत होते जाने को हास्य से पकड़ती हुई परिवेश के पर्यावरणीय संकट की ओर संकेत करती है. इसे एक बेहद संभावनाशील रचना के रूप में लिया जाना चाहिए. गंगा प्रसाद विमल की नुक्कड़ नाटक नुक्कड़ का सच है. कहानी अपनी तन्मयता में आस्था के स्पर्श तक पहुंचना चाहती है. गोविन्द मिश्र की  आकरामाला में हमारे संबंधों की संरचना में शहर धीरे से दाखिल होता है और धीरे-धीरे अपनी क्षुद्र उंचाइयां समेत स्थापित हो जाता है. वहां एक निर्जनता है जो अजनबीयत से पनपती है और त्रिशंकु की तरह बीच वरिमा में झूलने के अहसास से जीवन जल कहीं सूखता जाता है.

रवींद्र वर्मा की तस्वीरों का सच दृश्य माध्यम के सच की तस्वीर है. रमेश उपाध्याय की कहानी फासी-फंतासी फासी तक ठीक है, फंतासी तक आते-आते यह एक उत्तेजित यथार्थ रचने लगती है. मधुकर सिंह की नेताजी एक राजनीतिक परिदृश्य को सामने रखते हुए भी अधूरी सी  लगती है. एक बात जो सामने आती है वह यह कि राजनीतिज्ञ इतने भोले हैं कि कवितायेँ लिखते हैं. सतीश जमाली की हड़ताल ट्रकों की हड़ताल के बहाने ठहरे जीवन की कथा है. नीलकांत की उसका गणेश धैर्य से लिखी हुई अव्यवस्थित कहानी है. टनटनिया के चरित्र को अराजक मिथ में बदलते हुए लेखक वाचक  के वर्ग चरित्र को सुरक्षित रखता है. जवाहर सिंह की विषकन्या में एक असफल जीवन शैली का खोखलापन है. परेश की सिल्वर एक कूल टीचर में मृत्यु की ठंडी सुरंग से बाहर निकल आयी एक जीवित धरती है जिस तक कहानी अपने पूरे ठहराव से पहुँचती है. सुरेश सेठ की पिरामिड से सड़क तक तात्कालिकता से उत्प्रेरित स्फुट विचार है जो “अब कोई और सड़क बनानी होगी” के रहस्यवादी आदर्श तक पहुँचता है. राकेश वत्स की कामधेनु पढ़ते हुए मुझे रमेश उपाध्याय की कामधेनु (चतुर्दिक,1980) याद आयी. रमेश उपाध्याय ने कामधेनु का प्रयोग समाजवाद की स्थापना के लिए किया है तो राकेश वत्स ने साम्यवाद का छद्म उकेरने के लिए, दोनों जगह गाय भोली जनता है जिसका इस्तेमाल सिद्धांतवादी  विचारधारा को ज़माने-उखाड़ने में करते रहे हैं. महेश्वर की नगर जो देखन मैं चला क्रम से लिए गये बेहतर ‘स्नैप शाट्स’ हैं जो व्यंग्य की तरह यथार्थ के हिस्सों तक पहुँचते हैं और उसे समूचे यथार्थ में बदल देते हैं. शैलेन्द्र सागरगुलइची में महिला चरित्र रचने की योजना लेकर बढ़ते हैं और हद से हद ‘बिहारी यथार्थ’ तक पहुँच पाते हैं. दीपक शर्मा की खमीर से रमेश उपाध्याय की सफाईयां (सारिकाकथा पीढ़ी विशेषांक) याद आनी चाहिए. एक ऐसा प्रेम जो प्रतिप्रेम को जन्म देता है कि उसी से उपजता है.

 

(आगामी पोस्ट में वर्तमान साहित्य महाविशेषांक की कहानियों की चर्चा जारी)

…..जारी

 


हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग -7) (पूर्व से आगे)

विष्णु नागर की साधु का रास्ता असफल यात्राओं की कथा है, “जहां एक का अर्थ दूसरे को मंजूर नहीं और अर्थ बतानेवाले को भी अपने अर्थ पर शंका रहती है.” इंद्रमणि उपाध्याय की मौत दर मौत में भौतिकता में उलझी संवेदना का मरणराग बजता है. हृदयेश की मनु तटस्थ व्यंग्य के माध्यम से बदलते समाज और जड़ चेतना की शिनाख्त करती है. कहानी याद रहती है और कमलेश्वर की गर्मियों के दिन की याद दिलाती है. भीष्म साहनी की मान्यताएं एक ठहरे हुए समाज में वैचारिकता की आम सहमति की किस्म की परख करती है और इस तरह स्थापित कर पाती है कि किस तरह हमारे  निर्णयों की विचारधारा के केंद्र में मनुष्य की जगह कुछ तय सुविधाएं है. मार्कण्डेयहलयोग में ग्रामीण सामंतवाद की कुछ दंड प्रक्रियाएं लेकर उपस्थित हुए हैं. ए से एस और जेड से जेब्रा, आजकल संजीव कुछ एस तरह की संयोगात्मकता का भी उपयोग अपनी अभिव्यक्ति में करने लगे हैं और आप चौंकने के लिए स्वतन्त्र है. वैसे मांद कहानी में संजीव जो कर पाए हैं वह यह कि एक माहौल में पल रहे एक परिवार पर हावी होते वर्ग विभेद के दवाबों को ग्रामीण अंदाज से पकड़ते हैं. कि वह केवल मांद है जहां सुरक्षा और सुविधा का दमघोंटू अहसास है और अपनी जमात मांद से बाहर है. स्वयं प्रकाशहत्या कहानी के दो प्रसंगों में संवेदनाओं को उनकी मौलिकता में बचने की फ़िक्र से जुड़े है.

शशांक की कहानी बालूभीत पवन का खंभा एक तनाव की तरह फैलती है और धीरे से उसमें उठती है व्यतीत-मोह की सुगंध. “माया सुनो तो देखो. वह लड़की तुम्हारे बचपन की माया नहीं लगती?” बीत हुए को फिर से पा लेने की मोह भरी जिद, शायद यही है जो इस बिखराव भरे जीवन का गोंद है. मोहन थपलियाल की कहानी एक वक्त की रोटी बिना किसी बड़बोलेपन के हमारे सामने डिबली के एक वक्त के जीवन की कथा कहती है. पानी से लेकर रोटी तक के जुगाड़ में डिबली  की पहाड़ सी मशक्कत हमारी चौवालीस साला आजादी के खिलाफ सबसे सशक्त व्यंग्य है. राजेन्द्र दानी की उनका जीवन में उनके दुःख को मिथ में बदल देने की कोशिश मुझे अजीब लगती है. हां, उनके जीवन से हमारे अंदर उठता भय कुछ समझ में आता है. निजी सेना (हंस, सितंबर, 1987) के बाद जयनंदन ने लगातार इतनी कहानियां लिखी कि पाठक कहानी का नाम भले याद न रख पाये जयनंदन का नाम नहीं भूलता. तो ऐसे में यह सूचना के तौर पर लिया जाना चाहिए कि जयनंदन की कहानी छुट्टा सांड आयी है. मेढक शैक्षणिक स्मृतियों का रोचक स्मरण है, पर कहानी के रूप में इसका प्रभाव कमजोर है ऐसा गंभीर सिंह पालनी जी भी मानेंगे. महेश दर्पण की दरारें में एक घर की दीवारों पर पड़ती दरारों से जीवन में उठती दरारें हैं.

अमरकांत की श्वान गाथा पढकर श्रीकांत की कुत्ते (सारिका, जुलाई, 1982) कहानी याद आती है. ये कहानियां एक दूसरे का विकास हैं जिसे दो भिन्न पीढ़ी के लेखक अपने समय की जिम्मेवारी से उठाते हैं. श्रीकांत की कुत्ते में कुत्ता के खोने से खड़ा हुआ सरकारी तमाशा है तो अमरकांत की श्वान गाथा में कुत्ता काटने को लेकर क्रांतियां-प्रतिक्रन्तियां तक हो जाती हैं. कुल मिलाकर यह हमारे समय पर गैर मुद्दे की बातों का आच्छादित होना है.

(आगामी पोस्ट में वर्तमान साहित्य महाविशेषांक की कहानियों की चर्चा जारी)

…..जारी

%d bloggers like this: