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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

 – राकेश रोहित

(भाग- 20) (पूर्व से आगे)

उद्भावना‘ रचनात्मक जिद की पत्रिका है और यह इसी का प्रतिफलन है कि वह मुद्दों पर एक विचलन की स्थिति पैदा कर पाती है. यही रचनात्मक जिद असगर वजाहत की आज की रचनाओं में देखी जा सकती है. वे अपनी पूरी कोशिश से आपको स्तब्ध कर सोचने पर विवश करती हैं. और यह अकारण नहीं है कि उद्भावना -24 में असगर वजाहत की बारह रचनाएं हैं. वे सांप्रदायिकता के विविध पहलुओं के अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मता से निरीक्षण करती हैं. गुरु-चेला संवाद असगर वजाहत की चर्चित रचना-कड़ी है और प्रभावी भी, जहां बात बड़ी सहजता से मुद्दों तक पहुँचती है. असगर वजाहत की एक और कहानी नाला (पल-प्रतिपल, अप्रैल-जून 1991) एक अनिवार्य आतंक को सामने करती है कि अपनी चिंताओं के मोर्चे पर हम कितने अकेले हैं. अशोक गुप्ता की ठहर जाओ सोनमुखी (वही) एक बालकोचित भावुक अपील है जो नानी के मौलिक व्यक्तित्व पर पड़ती

मुझे लगा जंगलों में रहते हुए आदमी जिंदगी में जो मिलता है उसी को बोते चलता है और धीरे-धीरे दु:खों का एकसमानांतर जंगल खड़ा कर लेता है.” 

हवेली की छाया का प्रतिषेध करती है और इसी बहाने एक वर्ग की मुक्ति की फ़िक्र. मंजूर एहतेशाम की कहानी कड़ी (पहल40) बताती है कि कारण और परिणाम की दुनिया में हमारी जिंदगी किस तरह अपने भ्रम सहित निष्कर्ष और प्रयोग में गुजर जाती है. शशांक की पूरी रात (वही) मर रही दुनिया में कठिन सपनों के आंतरिक आतंक की कहानी है. भालचन्द्र जोशी की पहाड़ों पर रात (वही) बहुत ही अच्छी कहानी है. बिल्कुल सीधी-सादी कहानी, एक सुलझी गंभीर भाषा जो अनुभव की ईमानदारी से हासिल होती है और जो आदिवासियों के बहाने एक शोषित वर्ग के दुःख को सच्ची पीड़ा से महसूसते हुए कहीं अपने को बचाने या ‘जस्टीफाई’ करने की कोशिश नहीं करती है. इसे पढ़ना एक गहरे अनुभव से गुजरना है. यह बात कितनी अनुभूत पीड़ा से उपजती है, “मुझे लगा जंगलों में रहते हुए आदमी जिंदगी में जो मिलता है उसी को बोते चलता है और धीरे-धीरे दु:खों का एक समानांतर जंगल खड़ा कर लेता है.”

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

जिंदगी और घर

(आगामी पोस्ट में पहल- 42 की कहानियों पर चर्चा)

…जारी


हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 18) (पूर्व से आगे)

सुरेश कांटक की कहानी धर्म संकट (हंस, अगस्त 1991) में अवधेश  का संकट  आज के शुद्धतावादी हिंदी कथाकार का संकट है जो अपनी वैचारिकता से न तो किसी नैतिकतावादी संबंध को ‘जस्टीफाई’ करने की स्थिति में है और न ही उसके पास किसी भौतिकतावादी संबंध की दैहिकता को स्वीकार करने का साहस है. वह इसके मध्य फंसा है जैसे उसकी कहानी. रंजन जैदी की कहानी तब और अब (इंद्रप्रस्थ  भारती, मार्च 1991) भी इसी का उदाहरण है, जहाँ लेखक फ्रायड को पढ़ने के बाद भी नियतिवादी आग्रह से मुक्त नहीं है. प्राइवेट लाइफ  की गीतांजली श्री  की  दहलीज (हंस, अगस्त 1991) में भाषा की नफासत पहले चौंकाती है प्रभावित बाद में करती है. मृणाल पांडे की कहानी  हिर्दा  मेयो का मंझला (हंस, अक्टूबर 1991), शशांक की कहानी सुदिन (हंस, वही) और गुलज़ार की कहानी सनसेट बुलेवार (हंस, वही) अपनी पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है और अपेक्षा अधूरी रह जाती  है. पर इसके बावजूद गुलजार की सनसेट बुलेवार में चारुलता का अपने मकान के प्रति मोह अपने समय के विरुद्ध कुछ जो व्यक्तिगत है, प्रिय है को बचा लेने की इच्छा है और समय की नृशंसता  जिसकी अस्ति का अंत कर देती है. सी. भास्कर राव की आतंक (हंस, वही) अपनी कथात्मकता और उसमें अंतर्निहित आस्था के कारण प्रभावी है. हवन (गंगा) से सुपरिचित हुईं सुषम बेदी की कहानी पार्क में (हंस, वही) आयी है जो अंत में इराक-अमरीका युद्ध में एक मनुष्य के पक्ष के अकेले पड़ते जाने को पकड़ती है. विजय प्रताप की  कहानी वैक्यूम (हंस, वही) वैज्ञानिक विजन का उपयोग करते हुए प्रायोगिक और सैद्धांतिक के अंतर्विरोध को छूती है और इस अंत तक पहुंचना कि कोई सिद्धांत निरपेक्ष नहीं होता कि बचपन में जो शिक्षा हमें दी जाती है उसे अमल में लाने के लिए वैक्यूम जैसी किसी विशेष स्थिति की जरूरत होती है, सचमुच अपनी सीमाओं में हमें परेशान करता है. असलम की यप-यप-यप्पी (हंस, नवम्बर 1991)  मूल्यों के बदलाव और धीरे-धीरे उसमें अमानवीयता के सहज शुमार का ग्राफ है. शफी जावेद की कहानी अजनबी (हंस, वही) की शांत भाषा का तनाव महत्वपूर्ण है. एक सवाल जो कहानी उभारती है -क्या औरत से शादी करने के लिए उसके धार्मिक विश्वास को भी अपनाना जरूरी है? आनन्द बहादुर की कबाब (हंस, दिसंबर 1991) खंडश: प्रभाव  में एक अच्छी कहानी लगती है पर विचार के रूप में यह निकट-दृष्टि से मुक्त नहीं हो पाती है. और यह आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि धर्म को लेकर जिस संक्रमणशील  दौर में हम रह रहे हैं वहां अपने नजरिये को ‘एबसोल्यूट’ रूप में विकसित कर पाना बहुत कठिन है. ऐसा लगता है इस कहानी में लेखक अजाने में उस स्थिति को स्वीकृत कर रहा है जिसमें दबावों के बीच एक आदमी अपनी मान्यताओं के साथ सुरक्षित नहीं है.

सूर्यास्त/ अन्विता के.

सूर्यास्त/ अन्विता के.

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग -7) (पूर्व से आगे)

विष्णु नागर की साधु का रास्ता असफल यात्राओं की कथा है, “जहां एक का अर्थ दूसरे को मंजूर नहीं और अर्थ बतानेवाले को भी अपने अर्थ पर शंका रहती है.” इंद्रमणि उपाध्याय की मौत दर मौत में भौतिकता में उलझी संवेदना का मरणराग बजता है. हृदयेश की मनु तटस्थ व्यंग्य के माध्यम से बदलते समाज और जड़ चेतना की शिनाख्त करती है. कहानी याद रहती है और कमलेश्वर की गर्मियों के दिन की याद दिलाती है. भीष्म साहनी की मान्यताएं एक ठहरे हुए समाज में वैचारिकता की आम सहमति की किस्म की परख करती है और इस तरह स्थापित कर पाती है कि किस तरह हमारे  निर्णयों की विचारधारा के केंद्र में मनुष्य की जगह कुछ तय सुविधाएं है. मार्कण्डेयहलयोग में ग्रामीण सामंतवाद की कुछ दंड प्रक्रियाएं लेकर उपस्थित हुए हैं. ए से एस और जेड से जेब्रा, आजकल संजीव कुछ एस तरह की संयोगात्मकता का भी उपयोग अपनी अभिव्यक्ति में करने लगे हैं और आप चौंकने के लिए स्वतन्त्र है. वैसे मांद कहानी में संजीव जो कर पाए हैं वह यह कि एक माहौल में पल रहे एक परिवार पर हावी होते वर्ग विभेद के दवाबों को ग्रामीण अंदाज से पकड़ते हैं. कि वह केवल मांद है जहां सुरक्षा और सुविधा का दमघोंटू अहसास है और अपनी जमात मांद से बाहर है. स्वयं प्रकाशहत्या कहानी के दो प्रसंगों में संवेदनाओं को उनकी मौलिकता में बचने की फ़िक्र से जुड़े है.

शशांक की कहानी बालूभीत पवन का खंभा एक तनाव की तरह फैलती है और धीरे से उसमें उठती है व्यतीत-मोह की सुगंध. “माया सुनो तो देखो. वह लड़की तुम्हारे बचपन की माया नहीं लगती?” बीत हुए को फिर से पा लेने की मोह भरी जिद, शायद यही है जो इस बिखराव भरे जीवन का गोंद है. मोहन थपलियाल की कहानी एक वक्त की रोटी बिना किसी बड़बोलेपन के हमारे सामने डिबली के एक वक्त के जीवन की कथा कहती है. पानी से लेकर रोटी तक के जुगाड़ में डिबली  की पहाड़ सी मशक्कत हमारी चौवालीस साला आजादी के खिलाफ सबसे सशक्त व्यंग्य है. राजेन्द्र दानी की उनका जीवन में उनके दुःख को मिथ में बदल देने की कोशिश मुझे अजीब लगती है. हां, उनके जीवन से हमारे अंदर उठता भय कुछ समझ में आता है. निजी सेना (हंस, सितंबर, 1987) के बाद जयनंदन ने लगातार इतनी कहानियां लिखी कि पाठक कहानी का नाम भले याद न रख पाये जयनंदन का नाम नहीं भूलता. तो ऐसे में यह सूचना के तौर पर लिया जाना चाहिए कि जयनंदन की कहानी छुट्टा सांड आयी है. मेढक शैक्षणिक स्मृतियों का रोचक स्मरण है, पर कहानी के रूप में इसका प्रभाव कमजोर है ऐसा गंभीर सिंह पालनी जी भी मानेंगे. महेश दर्पण की दरारें में एक घर की दीवारों पर पड़ती दरारों से जीवन में उठती दरारें हैं.

अमरकांत की श्वान गाथा पढकर श्रीकांत की कुत्ते (सारिका, जुलाई, 1982) कहानी याद आती है. ये कहानियां एक दूसरे का विकास हैं जिसे दो भिन्न पीढ़ी के लेखक अपने समय की जिम्मेवारी से उठाते हैं. श्रीकांत की कुत्ते में कुत्ता के खोने से खड़ा हुआ सरकारी तमाशा है तो अमरकांत की श्वान गाथा में कुत्ता काटने को लेकर क्रांतियां-प्रतिक्रन्तियां तक हो जाती हैं. कुल मिलाकर यह हमारे समय पर गैर मुद्दे की बातों का आच्छादित होना है.

(आगामी पोस्ट में वर्तमान साहित्य महाविशेषांक की कहानियों की चर्चा जारी)

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