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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 16) (पूर्व से आगे)

चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी हिंगवा घाट में पानी रेहंस, मई 1987)  आजादी के बाद के हमारे प्रांतीय यथार्थ की एक विशिष्ट रचना है. इसमें जायसवाल जी ने ढह रहे सामंतवाद और पनप रहे नव्यतम राजनीतिक स्टंटों व छद्मों की गिरफ्त में फंसे भनटा और उसके समाज के दबावों को सामने रखा है. वर्तमान समय में भनटा जैसे लोगों की भोली आशाएं छली जाती रही हैं और इस छले जाने को भनटा अंत में स्वीकार भी करता है. पर अगर भनटा में स्थानीय स्तर पर सुरो बाबू से मुक्त होने की किसी चेतना का विस्तार नहीं हो रहा और भनटा खुद को शोषण की परंपरा में शामिल किये जाने को अहसान के साथ स्वीकारता है तो लगता है इनके यहां कहानियां अपनी अतिस्वाभाविकता में विचार को ‘ओवरटेक’ कर जाती हैं और इस तरह वे यथार्थ का अतिक्रमण करने की कोशिश में कोई समांतर यथार्थ नहीं रच पाती हैं. इस वर्ष चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी अभागा (हंस, अप्रैल 1991) आयी. अपराधआपरेशन जोनाकीदेवी सिंह कौन जैसी कहानियों के एक अंतराल के बाद इस कहानी (अभागा) को एक घटना के रूप में होना चाहिए क्योंकि यह कहानी परिवर्तन की मध्यवर्गीय इच्छा की शिनाख्त करना चाहती है. पर इसमें पूर्व पीढ़ी के मध्यकालीन अभियानों में शामिल होने की अभौतिक इच्छा का आनंद है और इस आनंद में लेखक इतना डूबता है कि वह उस पीढ़ी, जो यथास्थिति को पोषित करती है, को एक मजाकिये चरित्र में बदल देता है और नयी पीढ़ी के जीवन-विचार का संकट अनछुआ रह जाता है. इन सबके बावजूद चन्द्र किशोर जायसवाल की भाषा पर अद्भुत पकड़ यथार्थ के डीटेल्स को पकड़ने में नहीं चूकती है और कथात्मकता का एक सुन्दर वितान रचा जाता है.

विद्यासागर नौटियाल की कहानी फट जा पंचधार (हंस, अप्रैल 1991) को पढ़ना एक अनुभव से गुजरना है. स्त्री की तयशुदा नियति को अपनी मौलिक चेतना से नकारती रक्खी पंचधार के फट जाने की इच्छा के साथ अविस्मरणीय ढंग से उपस्थित होती है. संस्मरण की तरह लिखी गयी जितेन्द्र की कहानी नंद के लाल (हंस, मई 1991) अपने समय के सूचक के रूप में याद रखी जानी चाहिये. जितेन ठाकुर की वो एक दिन (हंस, जून 1991) बाल-कथा सी याद आती है और यह हिन्दी कहानी के लिए एक अच्छी बात भी हो सकती है. जयनंदन की गिद्ध झपट्टा (हंस, जून 1991) का सुन्दर विकास एक तय अंत तक पहुँचता है. पिंटी का साबुन के संजय खाती की पुतला (हंस, जुलाई 1991) यथार्थ की संरचना को उसके सही और समूचे स्वरूप में पाती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि खाड़ी युद्ध पर लिखी यह कहानी साम्प्रदायिकता की भी शिनाख्त करती है. वे कथाकार जिनकी समझ साम्प्रदायिकता और उसके विरुद्ध रचनात्मक हस्तक्षेप को लेकर गड्ड-मड्ड है, इससे संकेत ग्रहण कर सकते हैं. इसी वैज्ञानिक समझ का उपयोग विजय ने अपनी कहानी गोह (हंस, जुलाई 1991) में किया है जबकि गिरिराज किशोर की गुमचोट (हंस, जुलाई 1991) में यह ज्यादा साफ़ नहीं है. गोह में कासिम का वैचारिक सामूहिकी से एलियनेट कर दिया जाना विचार पर आज का सबसे बड़ा संकट है.

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 15) (पूर्व से आगे)

विजय प्रताप की कहानी खराब लड़कीहंस, जनवरी 1991) को मूल्य के अंत को सार्थक व्यावहारिकता के रूप में स्वीकार लिए जाने की कोशिश के रूप में समझा जा रहा है पर यह कहानी उतनी सहज नहीं कि इस मुद्दे पर आप इतनी आसानी से चिढ़ जाएं. दरअसल यह परिवार में रिश्तों को तार्किक ढंग से प्राप्त करने की वह  ‘एप्रोच’ है जहां नारी, प्रेम के अंत के इस समय में अपने को मुक्त कर सकती है. सुथि द्वारा आत्म-समर्थित जीवनशैली को पाने की यह प्रक्रिया कितनी सहज है इसका संकेत पिता और बेटी के बीच चाकू को उठाकर फेंक दिये जाने में मिलता है. इस कहानी से समय के तनाव को ‘फीमेल नेरेशन’ में आप उसी तरह पाते हैं जिस तरह अखिलेश की चिट्ठीहंस, अगस्त 1989) से ‘मेल नेरेशन’ में. श्यामा की रोटी (अशोक राही, वही) एक अच्छी प्रेम कहानी है जिसमें पगली श्यामा उस प्रेम की प्रतीक है, अनु द्वारा रोटी दिये जाने के बाद भी जिसका अंत इस दौर की नियति है. ‘नैरेटर’ (narrator) का कहानी के मध्य सीधा संवाद करना इसे रूमानी होने से बचाता है. लवलीन की  कुंडली ( वही, फरवरी १९९१) आफिसों में कम कर रही, और ‘मेल कमेन्ट’ से जूझती स्त्री की त्रासदी का बयान तो है पर इसे वैचारिकता को लेकर और सजग होना चाहिए था. सुभाष पन् की पहाड़ की सुबह (वही, मार्च 1991) लोककथा का गंभीर आनंद देती है. नरेंद्र नागदेव की लिस्ट ( वही) बेरोजगारी की स्थितियों पर लिखी अच्छी कहानी तो है पर इससे एक महत्वपूर्ण संकेत लिया जा सकता है कि यह वह कहानी है जो अनुभव को यथार्थ में बदलने की हडबड़ी से उपजती है. इससे अलग यहां यह जिक्र किया जाना चाहिए कि फैंटेसी के इसी उपयोग से भाईयों, मुझे जड़ की तलाश है (सत्यनारायणहंस जनवरी 1987) जैसी उत्कृष्ट रचना संभव हो सकी है.

कहा जाना चाहिए  हिन्दी कहानी में एक शहर होता है जो गांव सा दीखता है, एक गांव होता है जो शहर सा दीखता है  और एक बिहार होता है जो किसी सा नहीं दीखता है. वैसे बिहार वाले चाहें तो इस पर गर्व कर सकते है कि इस ‘बिहार’ का विकास हिन्दी कहानी में बिहार से बाहर भी बहुत हुआ और नकली जनवाद का आतंक रचने में ये कहानियां अव्वल रहीं. अब सुधीश पचौरी भले चिंता करें कि बिहार की कहानी में भागलपुर की खबर क्यों नहीं है? मुझे लगता है कि बिहार की कहानी का जो मूल संकट है वह यह कि यह न केवल अपने प्रान्त के परिवर्तनशील यथार्थ की उपेक्षा करती वरन् उससे काफी हद तक अनभिज्ञ भी है.  इतिहास- बोध जैसी चीज का यहां बिल्कुल अभाव है और इसलिए यह अपने समय में अपनी अजनबीयत को पकड़ पाने में पिछड़ जाती है और अक्सर यथार्थ को एकांगी नजरिये से देखती है. इस ‘टोटल कंसेप्शन’ के अभाव के बाद बिहार-कहानी में विजन का विकास हो पाना तो मुमकिन न ही  था, पर जैसा कि हिन्दी कहानी में होता है वह भाषिक क्षमता से विजन की अनुपस्थिति को छुपाती है और गाहे-बगाहे इसी प्रक्रिया से विजन को पाती है, वह भाषिक क्षमता प्राप्त करने में भी बिहार-कहानी अक्सर चूकती है. जबकि बिहार में कई सशक्त गद्य परंपराओं- वह चाहे  शिवपूजन सहायरामधारी सिंह दिनकररामवृक्ष बेनीपुरीराजा राधिका रमण प्रसाद सिंह का हो या फिर आंचलिकता का मिथ गढ़ने वाले ‘रेणु‘ का- लंबा इतिहास रहा है. ऐसे में आज यह देखना हैरत भरा है कि बिहार के कहानीकारों की  कोई ऐसी व्यक्तिगत पहचान नहीं है कि आप उन्हें कुछ मानक आधारों पर अलग कर सकें. इस सिलसिले में शायद एक नाम है जिसे विचार में अवश्य रखा जाना चाहिए, वह है- चन्द्र किशोर जायसवाल. इन्होने हिन्दी कहानी में जो खास चीज विकसित की है वह है कथा के समांतर सहज व्यंग्य की, सहायक भाव की तरह, उपस्थिति जो बिना किसी बड़बोलेपन के मनुष्य के अंतर के छद्म पर आघात करती है. और यह इसके बावजूद कि इनके यहां आंचलिकता न केवल आभिजात्य है, वरन् कथात्मकता की ‘डिमांड’ भी ज्यादा है.

(आगामी पोस्ट में चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 12) (पूर्व से आगे)

इफ्तखार अपने सतत ‘एलियनेशन’ से कब मुक्त होता है? शुकदेव सिंह इसे ‘खत्म होती दिलचस्पियों की रफ़्तार कहते हैं पर यह शायद उतना सटीक नहीं है. क्योंकि धीरे-धीरे वह अपने इस अस्तित्ववादी दर्शन से एकाकार होता है कि दुनिया उसके लिये घूम रही है. स्वयं मात्र को बचाने के लिये सारे गृहस्थी, सारी भावनाएं, सारे मूर्त-अमूर्त भाव नष्ट कर देता है. ऐसा लगता है वह भेड़िये से नहीं भाग रहा  बल्कि बैल, नटनियां और पिता को  भेड़ियों के बीच छोड़कर भाग रहा है. क्योंकि यह उसका अपना रचा दर्शन है. वह अपनी नियति को बैल, नटनियों और पिता की नियति से जोड़कर नहीं देखता. यही उसका खतरा है जिसे वह उठाना नहीं चाहता. वह दुनियावी प्रतिकूलताओं के खिलाफ एक वर्गीकरण रचता है. यह उसका श्रेष्ठि भाव है. जब तक वह बैल को गाड़ी भागने के काम का समझता है,  नटनियों को बेचे जाने के मसरफ की समझता है और पिता को हंसोड़ समझता वह अपने को केन्द्रीय इकाई मानकर दुनिया को झेलता है और खतरे से घिरा है. इसलिए वह या फिर उसके पिता अपनी स्थिति की भी सही समझ विकसित नहीं कर पाते. बड़े मियां अवश भाव से स्वीकारते हैं, “भीख मांग कर खाना बंजारों का दीन है हम रईस बनने चले थे.” इस चिंता में ग्वालियर की उन गदबदी नटनियों की कोई चिंता नहीं है ‘जो पंजाब में खूब बिक जाती हैं’. यह संवेदना का एक ‘क्लोज सर्किट’ है जो वर्गीय भिन्नता पर आधारित समाज की अधिरचना में मदद करती है. जहां हम जिस व्यवस्था को झेलते हैं उसे पोषित भी करते हैं.

पर कहानी यह साफ-साफ कहती है कि जब तक खारे का पिता अपनी नियति को  भेड़ियों के बीच फेंक दिये गये बैल और नटनियों की स्थिति से नहीं जोड़ता प्रतिकूलताओं का अंत नहीं होता. यह पिता की स्थिति का नटनियों की स्थिति से एकाकार हो जाना ही व्यक्ति के समूह में बदलने की प्रक्रिया की भूमि है. जिसे शुकदेव सिंह संज्ञा के नामिक रूपांतरण या तत्सम से तद्भव में बदल जाने की क्रिया कहते हैं. इफ्तखार अपना सब कुछ खोने के  बाद खारु में  बदल जाता है.  यह उसकी उस  छद्म  वैयक्तिक आइडेंटिटी का अंत है जिससे वह अब तक घिरा था. वह अब एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक इच्छा रह गया है जिससे उसकी सामूहिकता अभिव्यक्त होती है. दूसरे ही साल उसने साठ और भेड़िये मारे. इसके पीछे कोई रईस बनने की कथा नहीं थी न ही खुद को बचाने का संघर्ष वरन् यह उसकी सामूहिक स्मृति थी जो उसे  भेड़िये के खिलाफ करती थी. इस कहानी से यह समझा जा सकता है कि एक झुके आदमी के सीधा खड़ा होने की प्रक्रिया किस-किस मुकाम से गुजरती है.*

 

(* भेड़िये पर यह टिप्पणी डा. शुकदेव सिंह की ‘हंस, मई 1991 में प्रकाशित टिप्पणी “नयी कहानी की पहली कृति भेड़िये‘ ” से आरंभ बहस के क्रम में बीच बहस मेंहंस सितंबर,1991 में “मनुष्य की नियति का समय” शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और चर्चित रही थी. हंस के नवंबर, 1991 अंक में उस बहस की समापन टिप्पणी  “भेड़िये और भेड़िये” में डा. शुकदेव सिंह ने इस टिप्पणी की खास तौर पर चर्चा की थी और इसे महत्वपूर्ण माना था. बाद में यह टिप्पणी इसी रूप में ‘संदर्श के भुवनेश्वर पर केंद्रित अंक (अतिथि संपादक- चन्द्रमोहन दिनेश) में हंस से साभार प्रकाशित हुई थी.)

 

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 11) (पूर्व से आगे)

भुवनेश्वर की भेड़िये कहानी को वहां से समझा जाना  चाहिए जहां यह मनुष्य की नियति के समय को पकड़ने के क्रम में वैयक्तिक त्रासदी को मानवीय महात्रास में बदल देती है.  इफ्तखार के बहाने एक पीढ़ी या कहिये एक वर्ग के उस जीवन दर्शन को समझा जा सकता है जिससे वह अपनी नियति को उस समूह की नियति से अलग कर लेता है जो समान रूप से उसकी भी है. इस तरह वह एक अंतर्विभाजन रचता है और चीजों की प्राथमिकता उनकी उपयोगिता से तय करता है. यहीं से कुछ को कुछ से कमतर और कुछ को कुछ से बेहतर समझने की मानसिकता जन्म लेती है जिसके अधीन वह टिप्पणी करता है- पूरे बंजारों में उसका गड्डा अफसर था. यह एक असमानता का श्रेष्ठवादी दर्शन है जहां भेड़िये के खिलाफ लड़ाई को वह अपने बचे रहने की जद्दोजहद से जोड़ता है. तब उसे बैल उतने ही चाहिए जो गाड़ी दौड़ा ले जा सकें, नटनियां तभी तक जब तक वह गाड़ी पर बोझ न हों. यहीं कहीं वह उस प्रेम को नकारता है जिसे उसने एक क्षण बचा रखा था और बादी के बदले दूसरी  नटनियां को कूदने के लिये कहा था. यह एक किस्म की प्रतिहिंसा थी जो हिंसा को जन्म देती है. वह प्रेम को उसके सिरे से नकारने की चेष्टा करता है, “तुम खुद कूद पड़ोगी या मैं तुम्हें धकेल दूं.” और नटनियां उसी तर्ज पर चांदी की नथ उतार कर बाहों से आंखें बंद किये कूद जाती है. दरअसल यह प्रेम का वह ठहरा हुआ खास क्षण है जो इस नष्ट होते समय में बचा है. इफ्तखार को शायद शंका होती है कि बादी को वह कूदने के लिये नहीं कह सकेगा या शायद बादी ही उस पर भरोसा किये हो कि वह उसे बचा लेगा. इस तरह प्रेम उसके अन्दर की कमजोरी बन जाता है जो उसके अपने होने की शर्त  के विरुद्ध जाता  है. वह इससे निजात पाने के लिये अपनी झिझक के ऊपर यह कहने का साहस करता है, “तुम खुद कूद पड़ोगी या ….” यह एक क्रूर किस्म का व्यक्तिवाद है. बादी इसका प्रत्युत्तर है. वह चांदी की नथ उतारकर उसके हाथों में दे देती है जैसे आभास दे रही हो कि वह इसी के लिये रुकी थी. इस तरह वह अपने अन्दर के प्रेम का अंत करती है और बाहों से आंखें बंद किये अपनी नियति को स्वीकृत करती है. वह इफ्तखार के पिता की तरह कोई निर्देश नहीं देती कि वह उसके मरने के बाद उसके जूते नहीं पहने यद्यपि वो नये हैं. बादी का यह कूद पड़ना रीतिकालीन प्रेम के उत्सर्ग की नैतिकता नहीं रचता है. बल्कि एक झटके से वह अपनी उस स्थिति का संकेत करती है जो उस वक्त उसकी है और जिस असमान नैतिकता ने प्रेम का अंत कर दिया है जैसे प्रेम था ही नहीं.

…पर नियंता होने के दंभ ओढ़े इफ्तखार अपनी नियति को स्वीकार नहीं करता, वह अपने को ‘एलियनेट’ करता है. धीरे-धीरे वह सबको अपने से काटता है और एक खोखला आश्वासन ओढ़े रहता है कि अगर जिन्दा रहा तो  मैं एक-एक  भेड़िया काट डालूंगा. यह उसका आत्मस्वीकार है कि सारा व्यापार मात्र उसके जिन्दा रहने के लिये है. इफ्तखार कूद पड़ता है कि उसकी जिंदगी थोड़ी है. वह अपने अस्तित्व को ‘डाइल्यूट’ कर जिंदगी को एक यूनिट बनाता है. और मृत्यु को विवश अंगीकार करता है क्योंकि उसकी जिंदगी अपने बेटे की जिंदगी से ‘श्रेष्ठ’ नहीं है. वह अपने रचे दर्शन से अपनी स्थिति को परिभाषित करता है और पाता है. यही वह क्षण है जहां आप त्रास रचते भी हैं और उसमें शामिल भी होते हैं. धीरे-धीरे वह सारा अंतर मिट जाता है जो आपमें था, जो आपमें नहीं है. इफ्तखार के पिता में जीने का मोह था और बहाना भी. वह बुढ़ापे में बड़ा हंसोड़ हो गया था. वह अपने भाव की दुनिया रचता है – मारते-मरते मैं कह चलूंगा खारे-सा-खरा कोई निशानेबाज नहीं है. वह अपने जूते को लेकर कहता है, अगर मैं जिन्दा रहता तो दस साल और पहनता. इस तरह दस साल वह संबंध  और रहता जो खरे और उसके बाप के बीच था. लेकिन इफ्तखार के पिता ने खुद को न्यूनीकृत कर लिया.

(आगामी पोस्ट में महान कथाकार भुवनेश्वर की महत्वपूर्ण कहानी भेड़िये पर चर्चा जारी)

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग-10) (पूर्व से आगे)

सुरभि पांडेय की डगलस का जमाना नहीं, इधर तुम हो प्रभाकर कहानी में प्रेम की वापसी की सूचना है. पर अभिव्यक्ति का आवरण इतना जटिल है कि प्रेम की नन्हीं जान कहीं दुबकी सी लगती है. शायद सहज प्रेम को ‘जस्टीफाई’  करने के लिए हिंदी कहानी को और कालयात्राएँ तय  करनी हैं. लेखिका ने शीर्षक में जिस बेबाकी से प्रभाकर को याद दिलाना चाहा है कि यह जेम्स डगलस का जमाना नहीं है वह बेबाकी राधिका में अनुपस्थित है. बल्कि इसके विरुद्ध राधिका अपने अस्तित्व को स्वीकार किये जाने के समर्पण में बेचैन है. नवीन सागर की मोर एक लोककथायी जादू से रची गयी है. कहानी यह चिंता करती है कि किस तरह “हुल्ले  जो गरीब है, कमजोर है, विचलित हुए बिना पिटता चला जाता है और आख़िरी सांस तक अपनी जिद और सनक को छोड़ता नहीं है. कितना मुश्किल होता है एक ऐसा आदमी जबकि बस्तियां आबादियों से भरी पड़ी हैं.” कहानी उस त्रासदी को पकड़ती है कि एक मोर के प्रति कई मिथक रच रहे गांव में वह हुल्ले  बिना कोई हलचल पैदा किये मरकर अंततः मोर में बदल जाता है और लोग हुल्ले  को नहीं जानते.  बसंत कुमार की सौगात में जीवन की शांत झील में धीरे-धीरे किसी हलचल की तरह आतंक  फैलता है और तरलता बची रहती है. यह जीवन का सहज विश्वास है. मदनमोहन की कोई झूठ नहीं में माहौल को अपनी गिरफ्त में लेती और धीरे-धीरे उस पर हावी होती साम्प्रदायिकता और सम्प्रदायवादी सोच है. कमल चोपड़ा की शर्म में एक बच्चा दुनिया के बह रहे सत्त को बचाता है. हरिश्चंद्र अग्रवाल की परीक्षा में आस्था-अनास्था के बीच झूलती कुछ चालाक मानसिकता है जो ऐसे द्वंद्व को ‘एफोर्ड’ कर सकती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की एक स्त्री का एकांत राग अवास्तविक के सम्मोहन की फैंटेसी है.

महेश कटारे की द ग्रेट इंडियन सर्कस में राजनीतिक जोकरबाजी का बढ़िया करतब है. वैसे कहानी में सांस्कृतिक ढंग से मुस्करानेवाली विमलाजी और जालसाजी के पवित्र शब्द राव जी के मुँह में रखने वाले कामरेड विक्रम जी, जो कहते हैं, “ईश्वर ! यदि तू है तो मुझे क्षमा मत करना क्योंकि मैं जानता हूँ कि क्या कर रहा हूँ” के चरित्रों का विकास इसे भारतीय राजनीतिक दिवालियेपन की महत्वपूर्ण कथा रचना बना सकता था. फिलहाल यह एक व्यंग्य तो है ही. सुमति अय्यरविरल राग में लिखती हैं,  “लड़की सपनों की मौत बर्दाश्त नहीं कर पाती पर औरत सपनों की मौत से निस्संग रहती है” तो यह अन्दाज अच्छा लगता है. पर फिर यशी के सपनों का सीमित कैनवस में फैल जाना और यथार्थ के साथ उसकी असंगतता को अस्वीकारती रुमानियत भरी जिद से लगता है मानो “उस हल्के आलोक में शांत समुद्र के तट पर चट्टानों के पास रेत में एक सिम्फनी शांत हो गयी.”  हरि भटनागर की मुन्ने की उमर में जीवन की गतिक लयबद्धता की अनुपस्थिति का अनुभव है. मध्यवर्गीय जीवनचर्या की सीमित इच्छाओं भरी दिनचर्या में भयावह सुख के विलासी आतंक की तरह दाखिल होती शंकर की कहानी प्रस्थान एक अद्भुत रचना है. इसे अपनी स्थिति में लौटने के स्वीकार के रूप में लिया जाना चाहिए. तेजिन्दरतोकीदादा में सामाजिक व्यवस्था के रेशों की पहचान करते हैं जो धार्मिक उन्माद में अचानक गड्ड-मड्ड हो जाता है और हम इस कायम दुनिया में कुछ अस्पष्ट सा जीवन लिये रह जाते हैं. चित्रा मुदगल की बेईमान में कहानी अपना पक्ष कहने से रह जाती है. ममता कालिया की एक पति की मौत संवेदनशील रचना है. लेखिका ने इसका सलीके से विकास किया है कि किस तरह सिया संस्कारों के प्रति विद्रोह बचाते हुए अपनी इयत्ता में कायम रहती है. और फिर जैसे अपने अंदर वह अपने मृत पति नमन को ‘डिसकवर’ करती है और अपनी संवेदना से अपने दुःख को पाती है.

कहानी और कहानी के इस जमाव के बाद इस अंतराल की कहानी चुनना उस अनुभव को नकारना था जो आज की कहानी में आम होता है. और न केवल ‘कंसेप्शन’ वरन् ‘ट्रीटमेंट’ में भी जो कहानी अपना अलग प्रभाव रखती है वह है बल्लभ सिद्धार्थ की अश्लील (हंस, अगस्त 1991), प्रकाशकांत की अमर घर चल (हंस, सितंबर 1991) और रामधारी सिंह दिवाकर की द्वारपूजा (वर्तमान साहित्य, जुलाई 1991). इन कहानियों को पढते हुए मैंने जानने  की कोशिश की — इनमें वह क्या है जो इन्हें औरों से अलग करता है. पर इससे पहले मैं भुवनेश्वर की पुनर्प्रकाशित कहानी भेड़िये (हंस, मई 1991) की चर्चा जरूरी समझता हूँ क्योंकि इससे शायद कहानी के उस रूप को पाने की कोशिश बची रह सकती है आज की हिंदी कहानी जिसे बहुत ‘मिस’ करती है.

(आगामी पोस्ट में महान कथाकार भुवनेश्वर की महत्वपूर्ण कहानी  भेड़िये पर चर्चा)

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