Tag Archive: जवाहर सिंह



हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 23) (समापन कड़ी,  पूर्व से आगे)

देवेन्द्र चौबे  की दूसरा आदमी (नवभारत  टाइम्सदिल्ली  6 अक्टूबर  1991) में अकेली पड़ती घुटती  औरत है. नरेंद्र नागदेव की शीशा लग चुका है (जनसत्ता, 21 जुलाई,  1991) में बदलते वक्त की ‘असुरक्षा’  से घिरा व्यक्ति पारदर्शी आवरण की ‘सुरक्षा’ तलाशता है. खिजाब (जनसत्ता, 28 जुलाई 1991) में अलका सरावगी लिखती हैं, “दमयंती जी ने प्रेम और स्वतंत्रता में स्वतंत्र रहने का चुनाव कर लिया है कि प्रेम सारी सहूलियतें और सुरक्षाएं भले ही दे सकता है पर स्वतंत्रता छीन लेता है.” ऐसे में यह सहज ही सवाल उठता है कि क्यों अधिकांश लेखिकाएं अपनी बात नारी मुक्ति बनाम नारी चेतना की बहस से ही आरम्भ करती  हैं और कहानी अगर इस स्वतंत्रता के चुनाव को सनक भरे अस्त्तित्व में बदल देती है तो इससे क्या समझा जाये?  ज्योत्सना मिलन की पैर (संडे आब्जर्वर, 26 मई 1991) अच्छी कहानी है और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण.

विजय की तैयारी (मुहिम, सितंबर 1991) बिना किसी पूर्व तैयारी की लिखी रचना है जो हमारे उलझन भरे समय को सरल समीकरण में बदलने की चेष्टा करती है. जयनंदन अपनी कहानी छठतलैया  (मुहिम, सितंबर 1991)  में एक दुर्लभ किस्म का साम्प्रदायिक सदभाव रचते हैं. वासुदेव की प्रतीक्षा (मुहिम, सितंबर 1991)  मरणासन्न पिता की मृत्यु का प्रार्थनागीत है जो एक भौतिक विराग की संसृति करता है. और यह बात कई बार दुहराई गयी है. वलेनतीन रस्पुतीन (1937) की आख़री घड़ी से लेकर रामधारी सिंह दिवाकर की शोकपर्व (हंस) तक. हा धिक्, यह सार्वभौमिक प्रतीक्षा! मुहिम के पहले अंक में नारायण सिंह की कहानी स्त्रीपर्व स्त्री को उसकी गरिमा में स्थापित करती है. देवेन्द्र की बंटवारा (मुहिम-1) आंचलिक  यथार्थ की कहानी है. चंद्रकान्त राय की उमरकैद (मुहिम-1) यथार्थ को विभिन्न समय-कलाओं में पकड़ती हुई महत्वपूर्ण रचना बन जाती है. अकिंचन की कहानी सुग्गा भाग गया (रेल भारती, मार्च 1991) में पारिवारिक भावुकता अपनी प्रतीक योजना में पिछड़ जाती है. अमरेन्द्र मिश्र की टेलीफोन  (गूंज, अक्टूबर-दिसंबर 1991) में कहानी की तरह कहानीकार को अपना पक्ष पता नहीं है. प्रह्लाद श्रीमाली की कहानी दीवारें और आदमी  (मधुमती, अगस्त 1991) नये तरीके से लिखी गयी है. हनुमान दीक्षित की खाली हाथ  (मधुमती, अगस्त 1991)  आतंकवाद का विरोध करती है. सुरेन्द्र तिवारी की उसका साथ (भाषा, मार्च 1991) सम्भावना के बावजूद कहानी होने से चुकती है.

राजाराम सिंह की कहानी अंत्योदय (कतार-12) एक व्यंग्य की तरह हावी होती है पर कुछ नया नहीं रचती है. राजाराम रजक की टेनिया (कतार-12) में केवल एक सत्य है और सारी कहानी उसे सिद्ध करती है. अरविन्द कुमार की कहानी नइकी भौजी (कतार-12) में मासूमियत से उत्पन्न रुमानियत मासूमियत को नष्ट कर देती है. धनेश दत्त पाण्डेय की करवट (कतार-12) मनुष्य के शोषण और उसके इस्तेमाल की कहानी है. समकालीन परिभाषा -6 में श्याम अविनाश की हाथखुर्शीद अकरम  की उमस और जेब अख्तर की ग्राफ नाराज-कहानी है जो हमारी नाराजी को व्यवस्था-विरोध में दर्ज करती है. सूरज प्रकाश की बाजीगर (संभव-7) जीवन के नाटक में  विरोध को बाजीगरी की तरह सहज  बनाना चाहती है. जवाहर सिंह की कफन की चिंता  (संभव -8,9,10) यथार्थ के भयानक होते जाने की खबर देती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की जी. डी. उर्फ गरीब दास (संभव -8,9,10) में भाषा और शिल्प का बेहतर प्रयोग कहानी को चुस्त बनाता है. कुंदन सिंह परिहार की अपराध  (साम्य -17) कहानी का अंत प्रभावी है.

सुधाकर की जुबेदा का गुस्सा (संवेद– 1) एक छोटी पर अच्छी कहानी है. शब्दों की सचेत मितव्ययिता मन को बेधती है पर अंत में जुबेदा का तुतलाकर बोलना खरता है. सच को कहने के लिए मासूमियत के सहारे की  जरुरत नहीं होनी चाहिए. “इंसान चाहे तो कम-से-कम चीजों से भी अपना कम चला सकता है, ” सरफराज द्वारा नियति के इस स्वीकार को जुबेदा साइकिल की मांग कर तोड़ती है तो लगता है जैसे एक सन्नाटी संवादहीनता टूटती है. चंद्रमोहन प्रधान की खटमल (संवेद– 1) में खटमल को भी न मारनेवाले मंत्री  हुलास सिंह अपने अत्याचारी भाईयों को जिस तरह पिटवाते है वह फ़िल्मी रुमानियत के हिसाब से ही अच्छी लग सकती है. वैसे इस कहानी में ‘हवेली’ शब्द का अच्छा प्रयोग हुआ है जैसे, “हवेली को मारा कम घसीटा अधिक गया.” शिव कुमार शिव की शताब्दी का सच (संवेद– 1) भागते हुए शहर भागलपुर के आतंक की कथा है. कहा जा सकता है कि ‘संवेद‘ पत्रिका अपने पहले अंक से उम्मीद जगाती है और रचनात्मक नैतिकता का पूरी जिम्मेवारी से निर्वाह करती है.

1992 के उत्तरार्द्ध में आयी, खासकर वर्तमान साहित्य कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता- 1991 में पुरस्कृत कहानियाँ हिंदी कथा लेखन के नये रुझान का संकेत देती है. चंदन प्रसाद सिंह की स्कूपविनोद अनुपम की आयरन , फूलचंद गुप्ता की प्रायश्चित नहीं प्रतिशोधडा. ईश्वर दत्त वर्मा की धर्मयुद्ध जैसी कहानियाँ यथार्थ को बारीक ‘विट’ के सहारे  पकडती है और यह  शायद हिंदी कहानी में एक तार्किक कथात्मकता की शुरुआत है जो विशुद्ध गल्पवाद  से भिन्न है. कारखाना के नये अंक में चंद्रकांत राय की जूते जादुई यथार्थवादी कहानी होते हुए भी जमीनी यथार्थ से किस तरह जुडी रहती है यह देखना महत्वपूर्ण है. इनके आलावा अन्य उल्लेखनीय कहानियों में ना सम जियत न मुंअले माहीं (प्रकाश  उदय), सेवड़ी रोटियां और जले आलू (हरि भटनागर), कर्मयोग (अब्दुल बिस्मिल्लाह), उपचार (गोविन्द मिश्र) आदि का नाम लिया जा सकता है पर इनकी चर्चा फिर कभी.

संभावना / राकेश रोहित

 …तो ऐसा था हिंदी कहानी का एक संभावनापूर्ण साल!

समाप्त

Advertisements

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग -9) (पूर्व से आगे)

 

काशीनाथ सिंह की एक लुप्त होती हुई नस्ल एक खास समूह के विलुप्तीकरण की सूचना है जो समूह सामाजिकता को अपनी जीवन शैली में जोड़कर देखता है. यह कहानी उस बरदेखुआ  नस्ल के असंगत होते जाने को हास्य से पकड़ती हुई परिवेश के पर्यावरणीय संकट की ओर संकेत करती है. इसे एक बेहद संभावनाशील रचना के रूप में लिया जाना चाहिए. गंगा प्रसाद विमल की नुक्कड़ नाटक नुक्कड़ का सच है. कहानी अपनी तन्मयता में आस्था के स्पर्श तक पहुंचना चाहती है. गोविन्द मिश्र की  आकरामाला में हमारे संबंधों की संरचना में शहर धीरे से दाखिल होता है और धीरे-धीरे अपनी क्षुद्र उंचाइयां समेत स्थापित हो जाता है. वहां एक निर्जनता है जो अजनबीयत से पनपती है और त्रिशंकु की तरह बीच वरिमा में झूलने के अहसास से जीवन जल कहीं सूखता जाता है.

रवींद्र वर्मा की तस्वीरों का सच दृश्य माध्यम के सच की तस्वीर है. रमेश उपाध्याय की कहानी फासी-फंतासी फासी तक ठीक है, फंतासी तक आते-आते यह एक उत्तेजित यथार्थ रचने लगती है. मधुकर सिंह की नेताजी एक राजनीतिक परिदृश्य को सामने रखते हुए भी अधूरी सी  लगती है. एक बात जो सामने आती है वह यह कि राजनीतिज्ञ इतने भोले हैं कि कवितायेँ लिखते हैं. सतीश जमाली की हड़ताल ट्रकों की हड़ताल के बहाने ठहरे जीवन की कथा है. नीलकांत की उसका गणेश धैर्य से लिखी हुई अव्यवस्थित कहानी है. टनटनिया के चरित्र को अराजक मिथ में बदलते हुए लेखक वाचक  के वर्ग चरित्र को सुरक्षित रखता है. जवाहर सिंह की विषकन्या में एक असफल जीवन शैली का खोखलापन है. परेश की सिल्वर एक कूल टीचर में मृत्यु की ठंडी सुरंग से बाहर निकल आयी एक जीवित धरती है जिस तक कहानी अपने पूरे ठहराव से पहुँचती है. सुरेश सेठ की पिरामिड से सड़क तक तात्कालिकता से उत्प्रेरित स्फुट विचार है जो “अब कोई और सड़क बनानी होगी” के रहस्यवादी आदर्श तक पहुँचता है. राकेश वत्स की कामधेनु पढ़ते हुए मुझे रमेश उपाध्याय की कामधेनु (चतुर्दिक,1980) याद आयी. रमेश उपाध्याय ने कामधेनु का प्रयोग समाजवाद की स्थापना के लिए किया है तो राकेश वत्स ने साम्यवाद का छद्म उकेरने के लिए, दोनों जगह गाय भोली जनता है जिसका इस्तेमाल सिद्धांतवादी  विचारधारा को ज़माने-उखाड़ने में करते रहे हैं. महेश्वर की नगर जो देखन मैं चला क्रम से लिए गये बेहतर ‘स्नैप शाट्स’ हैं जो व्यंग्य की तरह यथार्थ के हिस्सों तक पहुँचते हैं और उसे समूचे यथार्थ में बदल देते हैं. शैलेन्द्र सागरगुलइची में महिला चरित्र रचने की योजना लेकर बढ़ते हैं और हद से हद ‘बिहारी यथार्थ’ तक पहुँच पाते हैं. दीपक शर्मा की खमीर से रमेश उपाध्याय की सफाईयां (सारिकाकथा पीढ़ी विशेषांक) याद आनी चाहिए. एक ऐसा प्रेम जो प्रतिप्रेम को जन्म देता है कि उसी से उपजता है.

 

(आगामी पोस्ट में वर्तमान साहित्य महाविशेषांक की कहानियों की चर्चा जारी)

…..जारी

 

%d bloggers like this: