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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 21) (पूर्व से आगे)

जीवन में जो आदर्श है, बेहतर है की मासूम स्थापना का स्वप्न लेकर पहल‘-42 की कहानियां आती हैं. ये कहानियां सामान्यतः  किसी वैचारिक जीवट से प्रतिफलित न होने के बावजूद आदर्श के प्रति अपने आग्रह को सरल कथा-उपकरणों से बचाती हैं. स्वयं प्रकाश  की नेता जी का चश्मा में यह आग्रह नेताजी की मूर्ति के आँखों में बच्चे द्वारा बना सरकंडे का चश्मा लगा देखने और ‘इतनी सी बात’ पर हालदार साहब की आँखें भर आने से अभिव्यक्त होता है. तो  सुबोध कुमार श्रीवास्तव  की कहानी धक्का  में ‘बचऊ’ द्वारा दीवार को पेशाब की धार से सींचने और उस पर उसकी माँ द्वारा आवाज देने से कि – “नंगा रहेगा तो ऐसे ही खेल खेलेगा.”  इसी तरह परगट सिंह सिद्धू की कहानी  मैं उदास हो जाता हूँ में खूबसूरत दुनिया के रंग को महसूसने से छूटती पीढ़ी है. लक्षमेंद्र चोपड़ा की स्टूल राजनीति की बढ़ती ऊँचाई के छद्म को पकड़ती है और नत्थू द्वारा स्टूल बड़े सरकार को उनकी जरुरत के लिए भेंट करने की बात कर इस निकाय में जन की स्थिति पर मासूम पर सार्थक व्यंग्य करती है और अंत में इसी आस्था से मोहभंग की अभिव्यक्ति है. सुभाष शर्मा की कलकत्ते का जादू में हाथ की सफाई है और कलकत्ते को लेकर आये वक्तव्यों की श्रृंखला की एक और कड़ी. इस लिहाज से अखिलेश की बायोडाटा एक महत्वपूर्ण कहानी है क्योंकि सामान्य तरीके से विकसित होती हुई यह कहानी राजनीति के छद्म की प्रवृत्ति को पकड़ने की कोशिश में स्थितियों और चरित्रों के प्रचलित मानकीकरण को नकारती हुई उस समय को अपने केन्द्र में रखती है जिसमें एक व्यक्ति की बदलती मानसिकता उसे एक सफल राजनीतिज्ञ बनाती जाती है. यह कहानी ठीक उस स्थल को छूती है जहाँ यह कहानी बनती है. …और यहीं छूटती सावित्री है जो ऐसे संतान की माँ बनती है – जो पीली और दुर्बल थी, चिचुकी हुई, बहुत बासी तरोई की तरह. उसमें जीवन  के चिन्ह नहीं थे, जीवन गायब था. बस जीवन की परछाई जैसे धप से गिर पड़ी हो.”  इस तरह यह कहानी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में पीलियाई नई पीढ़ी के जन्म की भयावह सूचना देती है. और इससे राजदेव सिंह बिल्कुल निर्लिप्त है. वे अपने बायोडाटा की ‘मास-अपील’ पर सोचते हुए संतरा छीलने लगते है. “संतरे में बड़ा  रस था,” यह कहानी की सबसे भयानक पंक्ति है जो एक आतंक की तरह हमारे अंदर फैलती है. और यह वह संतरा है जिसके बारे में  कवि केदारनाथ सिंह  ने अपनी एक कविता में लिखा है –

…अपने हिस्से का संतरा 

मैं खाना चाहता हूँ 

इसलिए मेज की तरफ 

बढाता हूँ हाथ 

और कैसा करिश्मा है 

कि मेरे हाथ बढ़ाते ही 

वह गोल-गोल मेज 

अचानक हो जाती है 

पृथ्वी की तरह विशाल और अनंत 

……………………………..

संतरा मेरा है 

और मैं डर रहा हूँ सवेरे-सवेरे 

कि कहीं यह सीधी-सी बात 

कि संतरा मेरा है 

विवाद में ना पड़ जाये …!” (पहल  37, 1988-89)

आज से  लगभग पैंसठ वर्ष पूर्व की मान्यताओं को समझने के लिए चंद्रकिरण सौनेरेक्सा की  इज्जत हतक  (आजकल, अगस्त 1991)    तथा     विश्व प्रकाश दीक्षित बटुक की भद्र महिला (आजकल, अक्टूबर  1991) पढ़ी  जानी चाहिए. वे जो सीधी सच्ची कथा में ऊष्मा महसूसते हैं मुक्ता की जिन्दा है करनैल चंद (आजकल, अगस्त 1991) पढ़ सकते हैं. रमा  सिंह की नयन जलधार (आजकल, जुलाई  1991) में आंसू का ड्रामा है. दिलीप सिंह की कहानी अपना कंधा अपनी लाश (आजकल, सितम्बर 1991) में अच्छा व्यंग्य है.

फूलों-सा रंग हो जीवन में... पत्तों-सा हो हरापन!  -  राकेश रोहित

फूलों-सा रंग हो जीवन में... पत्तों-सा हो हरापन! - राकेश रोहित

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

…जारी

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बहुत थोड़े शब्द हैं, कहता रहा कवि  केवल

और सोचिए तो इससे निराश नहीं थे बच्चे.

खो रहे हैं अर्थ, शब्द सारे

कि प्यार का मतलब बीमार लड़कियां हैं

और घर, दो-चार खिड़कियां

धूप, रोशनी का निशान है

फूल, क्षण का रुमान!

और जो शब्दों को लेकर हमारे सामने खड़ा है

जिसकी मूंछों के नीचे मुस्कराहट है

और आँखों में शरारत

समय, उसके लिए केवल हाथ में बंधी घड़ी है.

घिस डाले कुछ शब्द उन्होंने, गढता रहा कवि  केवल.

ऐसे में एक कवि है कितना लाचार

कि लिखे दुःख के लिए घृणा, और उम्मीद को चमत्कार.

क्या हो अगर घिसटती रहे कविता कुछ तुकों तक

कोई नहीं सहेजता शब्द.

बच्चों के हाथ में पतंगें हैं, तो वे चुप हैं

लड़कियों के घरौंदे हैं तो उनमें खामोश पुतलियां हैं

माँ  के पास कुछ गीत हैं तो नहीं है उनके सुयोग

बहनों के कुछ पत्र, तो नहीं हैं उनके पते

कुछ आशीष तो नहीं है साहस

कहां हैं मेरे असील शब्द?

क्या होगा कविता का

बना दो इस पन्ने की नाव *

तो कहीं नहीं जाएगी

उड़ा दो बना कनकौवे तो

रास्ता भूल जायेगी.

केवल हमीं हैं जो कवि हैं

किए बैठे हैं भरोसा इन पर

एक भोली आस्था एक खत्म होते तमाशे पर

लिखते हैं खुद को पत्र

खुद को ही करते हैं याद

जैसे यह खुद को ही प्यार करना है.

एक मनोरोगी की तरह टिका देते हैं

धरती, शब्दों की रीढ़ पर

जबकि टिकाओ तो टिकती नहीं है

उंगली भी अपनी.

बहुत सारा उन्माद है

बहुत सारी प्रार्थना है

और भूलते शब्द हैं.

हमीं ने रचा था कहो तो कैसी

अजनबीयत  भर जाती है अपने अंदर

हमीं ने की थी प्रार्थना कभी

धरती को बचाने की

सोचो तो दंभ  लगता है.

हमीं ने दिया भाषा को संस्कार

इस पर तो नहीं करेगा कोई विश्वास.

लोग क्षुब्ध होंगे

हँस देंगे जानकार

कि बचा तो नहीं पाते कविता

सजा तो नहीं पाते उम्मीद

धरती को कहते हैं, जैसे

हाथ में सूखती नारंगी है

और जानते तक नहीं

व्यास किलोमीटर तक में सही.

टुकड़ों में बंट गया है जीवन

शब्द चूसी हुई ईख की तरह

खुले मैदान में बिखरे हैं

इनमें था रस, कहे कवि

तो इतना बड़ा अपराध!

बहुत थोड़े शब्द हैं, कहता रहा कवि केवल

घिस डाले कुछ शब्द उन्होंने, गढता रहा कवि केवल.

 

(* कविता लिखे जाने समय प्रकाशित होने का अर्थ सामान्यतया कागज पर छपने से था.)

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