ईश्वर ने शोक मनाया – राकेश रोहित


ईश्वर ने शोक मनाया. वह ईश्वर, ईश्वर नहीं है. हमारे मोहल्ले में रहता है और हरी सब्जियां बेचता है. हम सब उसे ईश्वर से ज्यादा हरी सब्जी से जानते हैं. मैं उसे ज्यादा नहीं जानता, पर इतना अवश्य कि ईश्वर है और हैं सब्जियां हरी-हरी. लेकिन एक शाम वह मेरे पास पहुंचा- “सब्जियां खरीद लीजिए भइया, हरी है.”

मुझे अचरज हुआ. मेरे पास कभी नहीं आता था वह. मैंने कहा- “ईश्वर तुम मुझे नहीं जानते लेकिन मेरी मजबूरी समझ सकते हो. मुझे खाना बनाना आता नहीं. पका-पकाया लाता हूँ, वही खाता हूँ.” पर वह बोले जा रहा था – “खरीद लीजिए हरी हैं. एक भी नहीं बिकीं. मोहल्ले में किसी ने नहीं खरीदा. आज मोहल्ले में शादी है. सभी दावत में शरीक होंगे. इधर मेरी माँ मर गई है. वही बोती, वही उगाती थी सब्जियां. मैंने सोचा आज भर बेच दूं कि फिर इतनी हरी न होगी सब्जियां.”

मुझे दुःख हुआ कि उसने शोक नहीं मनाया और बेचने चला आया सब्जियां. मैंने देखा उसके चेहरे की रंगत उतर रही थी और खतरे में था सब्जियों का हरापन. उधर चुप थे पर्यावरण विशेषज्ञ और मंत्रीगण. मैं ना करता रहा पर ईश्वर छोड़ गया मेरे घर हरी सब्जियां, फिर वह कभी पैसे लेने नहीं आया. अब भी रखी हैं वे हरी सब्जियां कि जब न होंगी सब्जियां और न होगा ईश्वर, मैं दराज से निकालूँगा सूखी भिन्डी कि कहूँगा था इसमें हरापन, कि था कभी ईश्वर! जिसने शोक मनाया. ईश्वर ने शोक मनाया. ooo

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हाय! हमें ईश्वर होना था -राकेश रोहित


हाय! हमें ईश्वर होना था.
जीवन की सबसे पवित्र प्रार्थना में
अनंत बार दुहराया जाना था इसे
डूब जाना था हमें
अनवरत अभ्यर्थना के शुभ भाव में
घिर जाना था
ईश्वर की अपरिचित गंध में
महसूस करना था
हथेली में छलछलाती
श्रद्धा का रहस्य-भरा अनुभव.

सत्य के शिखर से उठती
आदिम अनुगूंज की तरह
व्याप्त होना था हमें
पर इन सबसे पहले
हाय! हमें ईश्वर होना था.

ईश्वर.
धरती के सारे शब्दों की सुंदरता है इसमें
ईश्वर!
धरती की सबसे छोटी प्रार्थना है यह
ईश्वर?
हाय, नहीं हैं जो हम.

अभिमंत्रित आहूतियों से उठती है
उसकी आसक्ति
पितरों के सुवास की धूम से रचता है
उसका चेहरा
जीवन की गरमायी में लहकती है
उसकी ऊष्मा.
वह सब कुछ होना था
हम सब में, हमारे अंदर
थोड़ा-थोड़ा ईश्वर.

सोचो तो जरा
सभ्यता की सारी स्मृतियों में
नहीं है
उनका जिक्र
हाय! जिन्हें ईश्वर होना था.
हाय! हमें ईश्वर होना था.

ईश्वर का सच – राकेश रोहित


मैं समझता हूँ ईश्वर का सच
दुहराई गई कथाओं से सराबोर है
और जो बार-बार चमकता है
आत्मा में ईश्वर
वह केवल आत्मा का होना है.

जीवन के सबसे बेहतर क्षणों में
जब भार नहीं लगता
जीवन का दिन-दिन
और स्वप्नों को डंसती नहीं
अधूरी कामनाएं
तब भी मेरा स्वीकार
आरंभ होता है वैदिक संशय से
अगर अस्तित्वमान है ईश्वर
धरती पर देह धारण कर….

मैं समझता हूँ
सृष्टि की तमाम अँधेरी घाटियों में
केवल
सूनी सभ्यताओं की लकीरें हैं
कि जहां नहीं जाती कविता
वहां कोई नहीं जाता.
सारी प्रार्थनाओं से केवल
आलोकित होते हैं शब्द
कि ईश्वर का सच
ईश्वर को याद कर ईश्वर हो जाना है.

लोकतंत्र में ईश्वर – राकेश रोहित


एक आदमी
चूहे की तरह दौड़ता था
अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल.
एक आदमी
केकड़े की तरह खींच रहा था
अपने जैसे दूसरे की टाँग.
एक आदमी
मेंढक की तरह उछल रहा था
कुएँ को पूरी दुनिया समझते हुए.
एक आदमी
शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए
आँधी को गुज़रने दे रहा था.
एक आदमी
लोमड़ी की तरह न्योत रहा था
सारस को थाली में खाने के लिए.
एक आदमी
बंदर की तरह न्याय कर रहा था
बिल्लियों के बीच रोटी बाँटते हुए.
एक आदमी
शेर की तरह डर रहा था
कुएँ में देखकर अपनी परछाईं.
एक आदमी
टिटहरी की तरह टाँगें उठाए
आकाश को गिरने से रोक रहा था.
एक आदमी
चिड़िया की तरह उड़ रहा था
समझते हुए कि आकाश उसके पंजों के नीचे है
एक आदमी…!

एक आदमी
जो देख रहा था दूर से यह सब,
मुस्कराता था इन मूर्खताओं को देखकर
वह ईश्वर नहीं था
हमारे ही बीच का आदमी था
जिसे जनतंत्र ने भगवान बना दिया था.

केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग – राकेश रोहित


केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग.

एक दिन
जब करते हैं कृपा, महादेव
रीझती है भोली- भंडारी जनता
बढ़े चले आते हैं
वर्जित देव-प्रदेश में
बिखरे बालों
और बढ़ी मूँछोंवाले राक्षस.
बेशऊर, असभ्य , उजड्ड, गँवार
होते हैं आरूढ़ रत्नजडित सिंहासन पर.
वरदान के लोकतन्त्र के मारे
बहिष्कृत होते हैं देवता
पवित्र, अविनाशी, सुन्दर.
सलोने, सुगढ़, सजीले, नेत्रप्रिय देवता
स्वर्ग में कितना भाते हैं.

हवाएँ, आग, पानी और ऐसी ही तमाम
हमारी, आपकी आम जिंदगी की चीजें
उनके वश में हैं
यद्यपि वे ईश्वर नहीं हैं.
विलासप्रिय हैं देवता, रंग उन्हें भाता है
राग में डूबे हैं वे, प्रिय है उन्हें गंध
पर उन्हें नहीं भाता है तप.
पाप से मही डोलती है
और तप से डोलता है सिंहासन स्वर्ग का.
इंद्र को प्रिय नहीं है तप.

एक दिन वे
जिनका सृष्टि की तमाम चीजों पर नियंत्रण है
हार जाते हैं करके सारे उपाय,
तब सारे निरुपाय देवता
छोड़कर मदालसा अप्सराओं को रंगशाला में
करते हैं विचार
करते हैं प्रार्थना
और अचानक मनुष्य हो जाते हैं
निर्बल, निरीह, दया उपजाते हुए से.

इतने बड़े, इतने महान देवता
ईश्वर के सामने होकर विनीत
मद से चमकते
श्रद्धा से झुके हुए
माँगते हैं देवता होने के सुविधा का लाभ
सदा के लिए.
– कि अब तो बंद हो वरदान का यह सिलसिला
आखिर ये स्वर्ग है
आखिर हम देवता हैं
और हैं वे राक्षस
वे तो कर देंगे
स्वर्ग की मर्यादा को ही तहस-नहस.

इतनी पवित्र, निर्दोष चिन्ता पर मुस्कराते हैं ईश्वर
समझाते हैं…
कैसे न दें वरदान
अगर तप करते हैं राक्षस
भले वे सत्ता की मोहिनी के वश में
रख दें अपने ही सर पर हाथ.

देवताओं के प्रति करुण हैं ईश्वर
कभी-कभी वे देवताओं के पक्ष में हो जाते हैं
पर अब भी राक्षस जानते हैं
केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग
केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग.