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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 22) (पूर्व से आगे)

इंडिया टूडे (30 सितम्बर 1991) में माला भोजवानी  का परिचय हिंदी कहानी के नए हस्ताक्षर के रुप में कराया गया है. वस्तुतः भाषा व प्रस्तुति के लिहाज से कहीं भी उनकी कहानी कम नहीं पड़ती है पर साथ ही वह कुछ नया भी नहीं जोड़ती है. चिंदी  नामक इस कहानी में केवल एक वाक्य – “मेरा वजूद अपनी सुरभि में खोकर चिंदी-चिंदी हो चुका था,” कहानी के आखिर में लिख सकने के लिए कहानी तथा कहानी की एक पात्रा का नाम चिंदी रख देना लेखिका की कलात्मक अभियोजना तो दर्शा सकता है पर इससे वह कहानी उस ‘सौ फीसदी कला‘ वाले वृत्त से बाहर आने से रह जाती है जो ऐसी शैल्पिक सतर्कता से रचा जाता है. चिंदी कहानी को पढकर कमला चमोला की लाल फूलों वाला दुपट्टा (धर्मयुग, 3-9 नवंबर 1985) अनायास याद आती है. हेमंत की कहानी झूठ का सच्चा अंश  (धर्मयुग, 1-15 जनवरी 1991) अच्छी कहानी है जो अपनी समझ से प्रभावित करती है. निर्मल वर्मा की अंतराल  (साप्ताहिक हिंदुस्तान, 6-12 जनवरी 1991) में कहानी तक पहुंचना और उसे पा लेना एक अनुभव है. रामदरश मिश्र  की कहानी सोनू कब आएगा पापा (जनाधार भारती, अगस्त 1991) बल मनोविज्ञान पर आधारित रचना है जिसकी भाषा बड़ी मनोरम है. महेश दर्पण की जमीन (जनाधार भारती, अगस्त 1991) में वही अखबारी तनाव है जो कि धीरेन्द्र अस्थाना की कहानियों में भी कई बार दीखता है. अशोक गुप्ता की नींद (जनाधार भारती, अगस्त 1991) छल-जीवन के निश्छल नींद की कथा है. मैं बहुत हिचक के साथ कहना चाहूँगा कि सुशील कुमार की कहानी कनफूल (जनाधार भारती, अगस्त 1991) रेणु जी की याद ताजा कर देती है, पर यहाँ वह जो अस्पष्ट है, रेणु की तरह कहानी में कुछ नया विस्तार नहीं रच पाता. साथ ही बंसी के दुःख से चंदर बाबू के दुःख का साम्य रचनात्मक प्रतिबद्धता को डगमगाता है.

बटरोही की कहानी भागता हुआ ठहरा आदमी (समकालीन भारतीय साहित्य -43) में जीवनशैली को निरंतर बदलता विचार है तो कथा श्यामा सुन्दरी (समकालीन भारतीय साहित्य -43) में विजय मोहन सिंह ने तत्सम शब्दों से कथा कही है. धनेश दत्त पाण्डेय की कहानी मुर्गा हलाल (अक्षरा, अप्रैल-सितंबर 1991) अपनी सम्पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है. मुर्गा हलाल में मुर्गे का मालिक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में जब राक्षस बनकर मुर्गे की गर्दन मरोड़ देता है तो यह वह स्थल हो सकता था जहां कहानी को यथार्थ के जादू में प्रवेश करना था. पुन्नी सिंह की तीसरा चेहरा (अब – 18) बहुत मार्मिक कहानी है. सुभाष शर्मा की कहानी जल्लाद (अब – 18) भी बेरोजगारी तक कुछ ज्यादा यथार्थ से पहुँची है. राजेन्द्र चंद्रकांत राय की कहानी आदिम (अब – 18) में भोपाल के कुछ चित्र हैं. पुष्पपाल सिंह की कहानी फिर वही सवाल  (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991) की संभावनापूर्ण शुरुआत है पर कहानी युद्ध विरोध तक नहीं पहुँच पाती है. ये काले परदे कैसे हैं (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991) में कृष्ण बलदेव वैद तथा ईश्वर की सात और कहानियां (इंद्रप्रस्थ भारती, जुलाई-सितंबर 1991) में विष्णु नागर अपनी पहचान बरकरार रखते हैं जो कथा-शिल्प के नये मिजाज को पाने की कोशिश है. विष्णु नागर की ही शहीद रज्जब  (समकालीन भारतीय साहित्य -46) इस निकाय में मनुष्य की नियति पर अच्छा व्यंग्य है. इस कहानी की खासियत है कि यह छोटी होते हुए भी एक साथ कई फलकों को छूती है. नारायण सिंह की पानी (निष्कर्ष, मार्च 1991) यथार्थ की जमीन तक पहुँचती है कि उसी से उपजती है.

एक नन्हा करेला / राकेश रोहित

एक नन्हा करेला / राकेश रोहित

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

…जारी

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हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

– राकेश रोहित

(भाग- 18) (पूर्व से आगे)

सुरेश कांटक की कहानी धर्म संकट (हंस, अगस्त 1991) में अवधेश  का संकट  आज के शुद्धतावादी हिंदी कथाकार का संकट है जो अपनी वैचारिकता से न तो किसी नैतिकतावादी संबंध को ‘जस्टीफाई’ करने की स्थिति में है और न ही उसके पास किसी भौतिकतावादी संबंध की दैहिकता को स्वीकार करने का साहस है. वह इसके मध्य फंसा है जैसे उसकी कहानी. रंजन जैदी की कहानी तब और अब (इंद्रप्रस्थ  भारती, मार्च 1991) भी इसी का उदाहरण है, जहाँ लेखक फ्रायड को पढ़ने के बाद भी नियतिवादी आग्रह से मुक्त नहीं है. प्राइवेट लाइफ  की गीतांजली श्री  की  दहलीज (हंस, अगस्त 1991) में भाषा की नफासत पहले चौंकाती है प्रभावित बाद में करती है. मृणाल पांडे की कहानी  हिर्दा  मेयो का मंझला (हंस, अक्टूबर 1991), शशांक की कहानी सुदिन (हंस, वही) और गुलज़ार की कहानी सनसेट बुलेवार (हंस, वही) अपनी पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है और अपेक्षा अधूरी रह जाती  है. पर इसके बावजूद गुलजार की सनसेट बुलेवार में चारुलता का अपने मकान के प्रति मोह अपने समय के विरुद्ध कुछ जो व्यक्तिगत है, प्रिय है को बचा लेने की इच्छा है और समय की नृशंसता  जिसकी अस्ति का अंत कर देती है. सी. भास्कर राव की आतंक (हंस, वही) अपनी कथात्मकता और उसमें अंतर्निहित आस्था के कारण प्रभावी है. हवन (गंगा) से सुपरिचित हुईं सुषम बेदी की कहानी पार्क में (हंस, वही) आयी है जो अंत में इराक-अमरीका युद्ध में एक मनुष्य के पक्ष के अकेले पड़ते जाने को पकड़ती है. विजय प्रताप की  कहानी वैक्यूम (हंस, वही) वैज्ञानिक विजन का उपयोग करते हुए प्रायोगिक और सैद्धांतिक के अंतर्विरोध को छूती है और इस अंत तक पहुंचना कि कोई सिद्धांत निरपेक्ष नहीं होता कि बचपन में जो शिक्षा हमें दी जाती है उसे अमल में लाने के लिए वैक्यूम जैसी किसी विशेष स्थिति की जरूरत होती है, सचमुच अपनी सीमाओं में हमें परेशान करता है. असलम की यप-यप-यप्पी (हंस, नवम्बर 1991)  मूल्यों के बदलाव और धीरे-धीरे उसमें अमानवीयता के सहज शुमार का ग्राफ है. शफी जावेद की कहानी अजनबी (हंस, वही) की शांत भाषा का तनाव महत्वपूर्ण है. एक सवाल जो कहानी उभारती है -क्या औरत से शादी करने के लिए उसके धार्मिक विश्वास को भी अपनाना जरूरी है? आनन्द बहादुर की कबाब (हंस, दिसंबर 1991) खंडश: प्रभाव  में एक अच्छी कहानी लगती है पर विचार के रूप में यह निकट-दृष्टि से मुक्त नहीं हो पाती है. और यह आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि धर्म को लेकर जिस संक्रमणशील  दौर में हम रह रहे हैं वहां अपने नजरिये को ‘एबसोल्यूट’ रूप में विकसित कर पाना बहुत कठिन है. ऐसा लगता है इस कहानी में लेखक अजाने में उस स्थिति को स्वीकृत कर रहा है जिसमें दबावों के बीच एक आदमी अपनी मान्यताओं के साथ सुरक्षित नहीं है.

सूर्यास्त/ अन्विता के.

सूर्यास्त/ अन्विता के.

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

…जारी

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