हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं – राकेश रोहित


हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

(संदर्भ : भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’)

राकेश रोहित

(भाग- 12) (पूर्व से आगे)

इफ्तखार अपने सतत ‘एलियनेशन’ से कब मुक्त होता है? शुकदेव सिंह इसे ‘खत्म होती दिलचस्पियों की रफ़्तार कहते हैं पर यह शायद उतना सटीक नहीं है. क्योंकि धीरे-धीरे वह अपने इस अस्तित्ववादी दर्शन से एकाकार होता है कि दुनिया उसके लिये घूम रही है. स्वयं मात्र को बचाने के लिये सारे गृहस्थी, सारी भावनाएं, सारे मूर्त-अमूर्त भाव नष्ट कर देता है. ऐसा लगता है वह भेड़िये से नहीं भाग रहा  बल्कि बैल, नटनियां और पिता को  भेड़ियों के बीच छोड़कर भाग रहा है. क्योंकि यह उसका अपना रचा दर्शन है. वह अपनी नियति को बैल, नटनियों और पिता की नियति से जोड़कर नहीं देखता. यही उसका खतरा है जिसे वह उठाना नहीं चाहता. वह दुनियावी प्रतिकूलताओं के खिलाफ एक वर्गीकरण रचता है. यह उसका श्रेष्ठि भाव है. जब तक वह बैल को गाड़ी भागने के काम का समझता है,  नटनियों को बेचे जाने के मसरफ की समझता है और पिता को हंसोड़ समझता वह अपने को केन्द्रीय इकाई मानकर दुनिया को झेलता है और खतरे से घिरा है. इसलिए वह या फिर उसके पिता अपनी स्थिति की भी सही समझ विकसित नहीं कर पाते. बड़े मियां अवश भाव से स्वीकारते हैं, “भीख मांग कर खाना बंजारों का दीन है हम रईस बनने चले थे.” इस चिंता में ग्वालियर की उन गदबदी नटनियों की कोई चिंता नहीं है ‘जो पंजाब में खूब बिक जाती हैं’. यह संवेदना का एक ‘क्लोज सर्किट’ है जो वर्गीय भिन्नता पर आधारित समाज की अधिरचना में मदद करती है. जहां हम जिस व्यवस्था को झेलते हैं उसे पोषित भी करते हैं.

पर कहानी यह साफ-साफ कहती है कि जब तक खारे का पिता अपनी नियति को  भेड़ियों के बीच फेंक दिये गये बैल और नटनियों की स्थिति से नहीं जोड़ता प्रतिकूलताओं का अंत नहीं होता. यह पिता की स्थिति का नटनियों की स्थिति से एकाकार हो जाना ही व्यक्ति के समूह में बदलने की प्रक्रिया की भूमि है. जिसे शुकदेव सिंह संज्ञा के नामिक रूपांतरण या तत्सम से तद्भव में बदल जाने की क्रिया कहते हैं. इफ्तखार अपना सब कुछ खोने के  बाद खारु में  बदल जाता है.  यह उसकी उस  छद्म  वैयक्तिक आइडेंटिटी का अंत है जिससे वह अब तक घिरा था. वह अब एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक इच्छा रह गया है जिससे उसकी सामूहिकता अभिव्यक्त होती है. दूसरे ही साल उसने साठ और भेड़िये मारे. इसके पीछे कोई रईस बनने की कथा नहीं थी न ही खुद को बचाने का संघर्ष वरन् यह उसकी सामूहिक स्मृति थी जो उसे  भेड़िये के खिलाफ करती थी. इस कहानी से यह समझा जा सकता है कि एक झुके आदमी के सीधा खड़ा होने की प्रक्रिया किस-किस मुकाम से गुजरती है.*

 

(* भेड़िये पर यह टिप्पणी डा. शुकदेव सिंह की ‘हंस, मई 1991 में प्रकाशित टिप्पणी “नयी कहानी की पहली कृति भेड़िये‘ ” से आरंभ बहस के क्रम में बीच बहस मेंहंस सितंबर,1991 में “मनुष्य की नियति का समय” शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और चर्चित रही थी. हंस के नवंबर, 1991 अंक में उस बहस की समापन टिप्पणी  “भेड़िये और भेड़िये” में डा. शुकदेव सिंह ने इस टिप्पणी की खास तौर पर चर्चा की थी और इसे महत्वपूर्ण माना था. बाद में यह टिप्पणी इसी रूप में ‘संदर्श के भुवनेश्वर पर केंद्रित अंक (अतिथि संपादक- चन्द्रमोहन दिनेश) में हंस से साभार प्रकाशित हुई थी.)

 

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)

…जारी

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