हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं – राकेश रोहित


हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

राकेश रोहित

(भाग-10) (पूर्व से आगे)

सुरभि पांडेय की डगलस का जमाना नहीं, इधर तुम हो प्रभाकर कहानी में प्रेम की वापसी की सूचना है. पर अभिव्यक्ति का आवरण इतना जटिल है कि प्रेम की नन्हीं जान कहीं दुबकी सी लगती है. शायद सहज प्रेम को ‘जस्टीफाई’  करने के लिए हिंदी कहानी को और कालयात्राएँ तय  करनी हैं. लेखिका ने शीर्षक में जिस बेबाकी से प्रभाकर को याद दिलाना चाहा है कि यह जेम्स डगलस का जमाना नहीं है वह बेबाकी राधिका में अनुपस्थित है. बल्कि इसके विरुद्ध राधिका अपने अस्तित्व को स्वीकार किये जाने के समर्पण में बेचैन है. नवीन सागर की मोर एक लोककथायी जादू से रची गयी है. कहानी यह चिंता करती है कि किस तरह “हुल्ले  जो गरीब है, कमजोर है, विचलित हुए बिना पिटता चला जाता है और आख़िरी सांस तक अपनी जिद और सनक को छोड़ता नहीं है. कितना मुश्किल होता है एक ऐसा आदमी जबकि बस्तियां आबादियों से भरी पड़ी हैं.” कहानी उस त्रासदी को पकड़ती है कि एक मोर के प्रति कई मिथक रच रहे गांव में वह हुल्ले  बिना कोई हलचल पैदा किये मरकर अंततः मोर में बदल जाता है और लोग हुल्ले  को नहीं जानते.  बसंत कुमार की सौगात में जीवन की शांत झील में धीरे-धीरे किसी हलचल की तरह आतंक  फैलता है और तरलता बची रहती है. यह जीवन का सहज विश्वास है. मदनमोहन की कोई झूठ नहीं में माहौल को अपनी गिरफ्त में लेती और धीरे-धीरे उस पर हावी होती साम्प्रदायिकता और सम्प्रदायवादी सोच है. कमल चोपड़ा की शर्म में एक बच्चा दुनिया के बह रहे सत्त को बचाता है. हरिश्चंद्र अग्रवाल की परीक्षा में आस्था-अनास्था के बीच झूलती कुछ चालाक मानसिकता है जो ऐसे द्वंद्व को ‘एफोर्ड’ कर सकती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की एक स्त्री का एकांत राग अवास्तविक के सम्मोहन की फैंटेसी है.

महेश कटारे की द ग्रेट इंडियन सर्कस में राजनीतिक जोकरबाजी का बढ़िया करतब है. वैसे कहानी में सांस्कृतिक ढंग से मुस्करानेवाली विमलाजी और जालसाजी के पवित्र शब्द राव जी के मुँह में रखने वाले कामरेड विक्रम जी, जो कहते हैं, “ईश्वर ! यदि तू है तो मुझे क्षमा मत करना क्योंकि मैं जानता हूँ कि क्या कर रहा हूँ” के चरित्रों का विकास इसे भारतीय राजनीतिक दिवालियेपन की महत्वपूर्ण कथा रचना बना सकता था. फिलहाल यह एक व्यंग्य तो है ही. सुमति अय्यरविरल राग में लिखती हैं,  “लड़की सपनों की मौत बर्दाश्त नहीं कर पाती पर औरत सपनों की मौत से निस्संग रहती है” तो यह अन्दाज अच्छा लगता है. पर फिर यशी के सपनों का सीमित कैनवस में फैल जाना और यथार्थ के साथ उसकी असंगतता को अस्वीकारती रुमानियत भरी जिद से लगता है मानो “उस हल्के आलोक में शांत समुद्र के तट पर चट्टानों के पास रेत में एक सिम्फनी शांत हो गयी.”  हरि भटनागर की मुन्ने की उमर में जीवन की गतिक लयबद्धता की अनुपस्थिति का अनुभव है. मध्यवर्गीय जीवनचर्या की सीमित इच्छाओं भरी दिनचर्या में भयावह सुख के विलासी आतंक की तरह दाखिल होती शंकर की कहानी प्रस्थान एक अद्भुत रचना है. इसे अपनी स्थिति में लौटने के स्वीकार के रूप में लिया जाना चाहिए. तेजिन्दरतोकीदादा में सामाजिक व्यवस्था के रेशों की पहचान करते हैं जो धार्मिक उन्माद में अचानक गड्ड-मड्ड हो जाता है और हम इस कायम दुनिया में कुछ अस्पष्ट सा जीवन लिये रह जाते हैं. चित्रा मुदगल की बेईमान में कहानी अपना पक्ष कहने से रह जाती है. ममता कालिया की एक पति की मौत संवेदनशील रचना है. लेखिका ने इसका सलीके से विकास किया है कि किस तरह सिया संस्कारों के प्रति विद्रोह बचाते हुए अपनी इयत्ता में कायम रहती है. और फिर जैसे अपने अंदर वह अपने मृत पति नमन को ‘डिसकवर’ करती है और अपनी संवेदना से अपने दुःख को पाती है.

कहानी और कहानी के इस जमाव के बाद इस अंतराल की कहानी चुनना उस अनुभव को नकारना था जो आज की कहानी में आम होता है. और न केवल ‘कंसेप्शन’ वरन् ‘ट्रीटमेंट’ में भी जो कहानी अपना अलग प्रभाव रखती है वह है बल्लभ सिद्धार्थ की अश्लील (हंस, अगस्त 1991), प्रकाशकांत की अमर घर चल (हंस, सितंबर 1991) और रामधारी सिंह दिवाकर की द्वारपूजा (वर्तमान साहित्य, जुलाई 1991). इन कहानियों को पढते हुए मैंने जानने  की कोशिश की — इनमें वह क्या है जो इन्हें औरों से अलग करता है. पर इससे पहले मैं भुवनेश्वर की पुनर्प्रकाशित कहानी भेड़िये (हंस, मई 1991) की चर्चा जरूरी समझता हूँ क्योंकि इससे शायद कहानी के उस रूप को पाने की कोशिश बची रह सकती है आज की हिंदी कहानी जिसे बहुत ‘मिस’ करती है.

(आगामी पोस्ट में महान कथाकार भुवनेश्वर की महत्वपूर्ण कहानी  भेड़िये पर चर्चा)

…जारी

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