(एक)

चाहता तो मैं भी था
शुरू करूँ अपनी कविता
समुद्र से
जो मेरे सामने टंगे फ्रेम में घहराता है
और तब मुझे
अपना चेहरा आइने में नजर आता है
पर मुझे याद आयी नदी
जो कल आपना
घुटनों भर परिचय लेकर आयी थी
और मैंने पहली बार देखा था नदी को इतना करीब
कि मैं उससे बचना चाहता था
नहीं, मैं नदी से
उतना अपरिचित भी नहीं था
नदियां तो अकसर
हमसे कुछ फासले पर बहती हैं
और हमारे सपनों में किसी झील सी आती हैं.

मैं समझ रहा था
कि महसूसा जा सकता है
इस धरती पर नदी का होना.
बात नदी – सी प्यास से
शुरू हो सकती थी
बात नदी की तलाश पर
खत्म हो सकती थी
पर मैं कब चाहता हूँ नदी
अपने इतने पास
जितने पास समुद्र
मेरे सामने टंगे फ्रेम में घहराता है.

(दो)

बचे हुए लोग
किससे पूछेंगे अपना पता!
शायद नदी से
जो तब किसी उदास समुद्र की तरह
भारी जहाजों के मलबे तले
बहती रहेगी खामोश.

शायद तब वे पायेंगे
कोई समुद्र अपने पास
जो दूर, बहुत दूर, दूर है अभी
जिसे कभी देखा होगा पिता ने पास से.
कितना भयानक होगा
उस समुद्र का याद आना
जब पिता पास नहीं होंगे
किसी नदी की तरह.

शायद वे ढूंढेंगे नदी
किसी पहाड़, किसी झरने
किसी अमूर्त कला में
पर कठिन होगा
ढूँढ पाना अपना पता
जब पास नहीं होगी
कोई कविता यह कहती हुई
समुद्र नहीं है नदी,
समुद्र नहीं है नदी.