केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग.

एक दिन
जब करते हैं कृपा, महादेव
रीझती है भोली- भंडारी जनता
बढ़े चले आते हैं
वर्जित देव-प्रदेश में
बिखरे बालों
और बढ़ी मूँछोंवाले राक्षस.
बेशऊर, असभ्य , उजड्ड, गँवार
होते हैं आरूढ़ रत्नजडित सिंहासन पर.
वरदान के लोकतन्त्र के मारे
बहिष्कृत होते हैं देवता
पवित्र, अविनाशी, सुन्दर.
सलोने, सुगढ़, सजीले, नेत्रप्रिय देवता
स्वर्ग में कितना भाते हैं.

हवाएँ, आग, पानी और ऐसी ही तमाम
हमारी, आपकी आम जिंदगी की चीजें
उनके वश में हैं
यद्यपि वे ईश्वर नहीं हैं.
विलासप्रिय हैं देवता, रंग उन्हें भाता है
राग में डूबे हैं वे, प्रिय है उन्हें गंध
पर उन्हें नहीं भाता है तप.
पाप से मही डोलती है
और तप से डोलता है सिंहासन स्वर्ग का.
इंद्र को प्रिय नहीं है तप.

एक दिन वे
जिनका सृष्टि की तमाम चीजों पर नियंत्रण है
हार जाते हैं करके सारे उपाय,
तब सारे निरुपाय देवता
छोड़कर मदालसा अप्सराओं को रंगशाला में
करते हैं विचार
करते हैं प्रार्थना
और अचानक मनुष्य हो जाते हैं
निर्बल, निरीह, दया उपजाते हुए से.

इतने बड़े, इतने महान देवता
ईश्वर के सामने होकर विनीत
मद से चमकते
श्रद्धा से झुके हुए
माँगते हैं देवता होने के सुविधा का लाभ
सदा के लिए.
– कि अब तो बंद हो वरदान का यह सिलसिला
आखिर ये स्वर्ग है
आखिर हम देवता हैं
और हैं वे राक्षस
वे तो कर देंगे
स्वर्ग की मर्यादा को ही तहस-नहस.

इतनी पवित्र, निर्दोष चिन्ता पर मुस्कराते हैं ईश्वर
समझाते हैं…
कैसे न दें वरदान
अगर तप करते हैं राक्षस
भले वे सत्ता की मोहिनी के वश में
रख दें अपने ही सर पर हाथ.

देवताओं के प्रति करुण हैं ईश्वर
कभी-कभी वे देवताओं के पक्ष में हो जाते हैं
पर अब भी राक्षस जानते हैं
केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग
केवल देवताओं का नहीं है स्वर्ग.